Class 11 Hindi Aroh Chapter 2 Important Questions मियाँ नसीरुद्दीन

Class 11 Hindi Aroh Chapter 2 introduces students to Krishna Sobti’s memorable word-sketch of a traditional baker, Miyan Nasiruddin. The chapter helps CBSE students understand हुनर, खानदानी पेशा, तालीम, आत्मसम्मान and बदलती हुई कद्रदानी.

कृष्णा सोबती हिंदी कथा-साहित्य की महत्वपूर्ण लेखिका हैं। उनकी भाषा में हिंदी, उर्दू, पंजाबी और बोलचाल की ताजगी मिलती है। Class 11 Hindi Aroh Chapter 2 में उनका शब्दचित्र मियाँ नसीरुद्दीन पढ़ाया जाता है, जो उनके संग्रह हम-हशमत से लिया गया है।

इस पाठ में मियाँ नसीरुद्दीन नाम के खानदानी नानबाई का शब्दचित्र है। वे रोटी पकाने को सिर्फ रोज़गार नहीं, बल्कि कला मानते हैं। वे अपने वालिद और दादा से सीखे हुए हुनर पर गर्व करते हैं। Class 11 Hindi Aroh Chapter 2 Important Questions से छात्र मियाँ नसीरुद्दीन के स्वभाव, पेशे, बातचीत, पारंपरिक कला और पाठ की भाषा-शैली को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

Key Takeaways

  • कृष्णा सोबती: वे हिंदी कथा-साहित्य की विशिष्ट लेखिका हैं।
  • मियाँ नसीरुद्दीन: वे खानदानी नानबाई हैं और छप्पन किस्म की रोटियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • मुख्य विचार: असली हुनर काम करके सीखा जाता है, केवल नसीहत से नहीं।
  • पाठ का संदेश: पारंपरिक कारीगरी, अनुभव और कला की कद्र घटती जा रही है।

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Revise the chapter in three parts:

First 10 minutes: कृष्णा सोबती का जीवन, भाषा and मियाँ नसीरुद्दीन पाठ की पृष्ठभूमि

Next 10 minutes: मियाँ नसीरुद्दीन का व्यक्तित्व, खानदानी नानबाई पेशा and रोटी पकाने की कला

Final 10 minutes: तालीम की तालीम, बादशाह का प्रसंग, कारीगर, रोटियों के नाम and भाषा-शैली

Need help revising मियाँ नसीरुद्दीन के चरित्र-चित्रण और कथन-व्याख्या?

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न Class 11 Hindi Aroh Chapter 2 Important Questions

इन प्रश्नों में एक-दो वाक्य में उत्तर लिखें। उत्तर सीधे और तथ्यात्मक रखें।

Q1. मियाँ नसीरुद्दीन पाठ की लेखिका कौन हैं?

मियाँ नसीरुद्दीन पाठ की लेखिका कृष्णा सोबती हैं।

Q2. मियाँ नसीरुद्दीन पाठ किस संग्रह से लिया गया है?

यह पाठ कृष्णा सोबती के संग्रह हम-हशमत से लिया गया है।

Q3. मियाँ नसीरुद्दीन कौन थे?

मियाँ नसीरुद्दीन खानदानी नानबाई थे। वे तरह-तरह की रोटियाँ बनाने की कला में माहिर थे।

Q4. मियाँ नसीरुद्दीन किस बात के लिए प्रसिद्ध थे?

वे छप्पन किस्म की रोटियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध थे।

Q5. मियाँ नसीरुद्दीन ने रोटी पकाने का हुनर किससे सीखा?

उन्होंने यह हुनर अपने वालिद उस्ताद से सीखा था। यह उनका खानदानी पेशा था।

Q6. मियाँ नसीरुद्दीन के वालिद का नाम क्या था?

उनके वालिद मियाँ बरकत शाही नानबाई गढ़ैयावाले के नाम से मशहूर थे।

Q7. मियाँ नसीरुद्दीन के दादा का नाम क्या था?

उनके दादा का नाम मियाँ कल्लन था। वे आला नानबाई थे।

Q8. “अखबारनवीस” का अर्थ क्या है?

“अखबारनवीस” का अर्थ पत्रकार होता है।

Q9. मियाँ नसीरुद्दीन के अनुसार तुनकी कैसी होती है?

मियाँ नसीरुद्दीन के अनुसार तुनकी पापड़ से भी ज्यादा महीन होती है।

Q10. “शागिर्द” का अर्थ क्या है?

“शागिर्द” का अर्थ शिष्य या सीखने वाला व्यक्ति होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न 2 अंक Class 11 Hindi Aroh Chapter 2 Important Questions

इन प्रश्नों में दो से तीन पंक्तियों में उत्तर लिखें। उत्तर पाठ की घटना और सही संदर्भ से जुड़ा होना चाहिए।

Q1. लेखिका मियाँ नसीरुद्दीन के पास क्यों गई थीं?

लेखिका मियाँ नसीरुद्दीन से उनकी रोटी पकाने की कला और खानदानी हुनर के बारे में जानने गई थीं। वे उनके व्यक्तित्व और काम करने के अंदाज़ को समझना चाहती थीं।

Q2. मियाँ नसीरुद्दीन को नानबाइयों का मसीहा क्यों कहा गया है?

मियाँ नसीरुद्दीन रोटी पकाने की कला में माहिर थे। वे छप्पन किस्म की रोटियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध थे। इसलिए उन्हें नानबाइयों का मसीहा कहा गया है।

Q3. मियाँ नसीरुद्दीन ने अखबार वालों के बारे में क्या कहा?

उन्होंने अखबार बनाने वालों और अखबार पढ़ने वालों दोनों को निठल्ला कहा। उनका मानना था कि कामकाजी आदमी को इन बातों से क्या काम।

Q4. मियाँ नसीरुद्दीन अपने पेशे को किस रूप में देखते हैं?

वे अपने पेशे को केवल रोज़गार नहीं, बल्कि खानदानी कला मानते हैं। उन्हें अपने वालिद और दादा से मिली नानबाई परंपरा पर गर्व है।

Q5. “काम करने से आता है, नसीहतों से नहीं” का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि असली हुनर केवल सुनने या समझाने से नहीं आता। उसे हाथ से काम करके, अभ्यास करके और अनुभव से सीखा जाता है।

Q6. मियाँ नसीरुद्दीन ने रोटी बनाना सीखने से पहले कौन-कौन से काम सीखे?

उन्होंने बर्तन धोना, भट्टी बनाना और भट्टी को आँच देना सीखा। उनके अनुसार सीधे नानबाई का हुनर नहीं सीखा जा सकता, पहले तैयारी की तालीम जरूरी है।

Q7. “तालीम की तालीम भी बड़ी चीज़ होती है” से क्या आशय है?

इसका आशय है कि किसी काम को सीखने से पहले उसकी बुनियादी तैयारी सीखना जरूरी है। जैसे रोटी पकाने से पहले बर्तन, भट्टी और आँच का ज्ञान जरूरी है।

Q8. मियाँ नसीरुद्दीन कारीगरों को केवल शागिर्द क्यों नहीं मानते?

वे कहते हैं कि कारीगर केवल शागिर्दी नहीं करते, उन्हें मजदूरी भी दी जाती है। इससे पता चलता है कि वे काम और श्रम की कीमत समझते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न 3 अंक मियाँ नसीरुद्दीन Question Answer

इन प्रश्नों में घटना, व्यक्तित्व और कथन का भाव थोड़ा विस्तार से लिखें।

Q1. मियाँ नसीरुद्दीन का पहला शब्दचित्र कैसे बनाया गया है?

लेखिका ने मियाँ नसीरुद्दीन को चारपाई पर बैठे बीड़ी का मज़ा लेते हुए देखा। उनका चेहरा मौसमों की मार से पका हुआ था। आँखों में काइयाँ भोलापन था और पेशानी पर मंजे हुए कारीगर के तेवर थे।

इस छोटे-से वर्णन में उनका पूरा व्यक्तित्व उभर आता है। वे अनुभवी, चतुर, आत्मसम्मानी और अपने हुनर पर गर्व करने वाले आदमी लगते हैं।

Q2. मियाँ नसीरुद्दीन ने अपने खानदानी पेशे का वर्णन कैसे किया?

मियाँ नसीरुद्दीन बताते हैं कि नानबाई का हुनर उनके खानदान में पीढ़ियों से चला आ रहा है। उनके वालिद मियाँ बरकत शाही और दादा मियाँ कल्लन जाने-माने नानबाई थे।

वे कहते हैं कि उन्होंने यह कला बाहर से नहीं सीखी। बाप-दादा का हुनर उन्हें घर में मिला और वालिद के उठ जाने के बाद वे उसी ठीये पर आ बैठे। इससे उनके खानदानी पेशे पर गर्व प्रकट होता है।

Q3. मियाँ नसीरुद्दीन ने नसीहतों के बारे में क्या कहा?

जब लेखिका ने बुजुर्गों की नसीहत पूछी, तो मियाँ नसीरुद्दीन ने कहा कि नसीहत कैसी, काम करने से आता है, नसीहतों से नहीं। इस कथन में उनकी व्यावहारिक समझ दिखाई देती है।

वे मानते हैं कि हुनर किताबों या सलाह से नहीं आता। उसे काम में उतरकर, हाथ गंदे करके और अनुभव से सीखा जाता है। यही उनका जीवन-दर्शन है।

Q4. मियाँ नसीरुद्दीन ने “दूसरी पढ़ाई” का उदाहरण कैसे दिया?

मियाँ नसीरुद्दीन ने मदरसे की पढ़ाई का उदाहरण देकर समझाया कि यदि कोई बच्चा कच्ची, पक्की, दूसरी कक्षा छोड़कर सीधे तीसरी में बैठ जाए, तो पहले की पढ़ाई का क्या होगा।

इसी तरह नानबाई का हुनर सीखने से पहले बर्तन धोना, भट्टी बनाना और आँच देना सीखना जरूरी है। यह “तालीम की तालीम” है, यानी काम की बुनियादी तैयारी।

Q5. बादशाह के नाम का प्रसंग आते ही मियाँ नसीरुद्दीन की दिलचस्पी क्यों कम होने लगी?

मियाँ नसीरुद्दीन अपने बुजुर्गों के शाही बावर्चीखाने से जुड़े होने की बात गर्व से बताते हैं। लेकिन जब लेखिका ने पूछा कि किस बादशाह के यहाँ काम करते थे, तो वे स्पष्ट नाम नहीं बता पाए।

उन्हें लगा कि लेखिका बात की गहराई में जा रही है। इसलिए वे खीझ गए और बेरुखी दिखाने लगे। इससे उनके स्वभाव की एक मानवीय कमजोरी भी सामने आती है।

Q6. “खानदानी नानबाई कुएँ में भी रोटी पका सकता है” का आशय क्या है?

इस कहावत का आशय है कि असली हुनरमंद कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपना काम कर सकता है। मियाँ नसीरुद्दीन इस कहावत को अपने बुजुर्गों के कौशल से जोड़ते हैं।

उनका विश्वास है कि रोटी पकाने की कला केवल सामान्य सुविधा पर निर्भर नहीं है। सच्चा कारीगर स्थिति के अनुसार अपना हुनर दिखा सकता है।

Q7. मियाँ नसीरुद्दीन ने किन-किन रोटियों के नाम बताए?

मियाँ नसीरुद्दीन ने कई तरह की रोटियों के नाम बताए। इनमें बाकरखानी, शीरमाल, ताफतान, बेसनी, खमीरी, रूमाली, गाव, दीदा, गाज़ेबान और तुनकी शामिल हैं।

वे तुनकी को पापड़ से भी ज्यादा महीन बताते हैं। इससे उनकी रोटी बनाने की कला की विविधता और बारीकी का पता चलता है।

Q8. पुराने कद्रदानों के बारे में मियाँ नसीरुद्दीन की क्या भावना है?

मियाँ नसीरुद्दीन कहते हैं कि वे जमाने उतर गए और वे कद्रदान चले गए जो पकाने-खाने की कद्र करना जानते थे। आज लोग तंदूर से रोटी निकालते हैं, निगलते हैं और हजम कर लेते हैं।

इस कथन में उनके मन की निराशा है। उन्हें लगता है कि अब खाने की कला, स्वाद और मेहनत की पहले जैसी कद्र नहीं रही।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 5 अंक Class 11 Hindi Aroh Chapter 2

इन प्रश्नों में चरित्र-चित्रण, प्रसंग, कथन और पाठ का मुख्य भाव साथ लेकर उत्तर लिखें।

Q1. कृष्णा सोबती के जीवन और साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

कृष्णा सोबती हिंदी कथा-साहित्य की विशिष्ट लेखिका हैं। उनका जन्म 18 फरवरी 1925 को गुजरात, पश्चिमी पंजाब में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनकी प्रमुख रचनाओं में जिंदगीनामा, दिलोदानिश, ऐ लड़की, समय सरगम, डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, बादलों के घेरे और हम-हशमत शामिल हैं।

कृष्णा सोबती कम लिखने पर विश्वास करती थीं, लेकिन उनका लेखन विशिष्ट और प्रभावशाली है। उन्होंने हिंदी साहित्य को कई यादगार पात्र दिए, जैसे मित्रो, शाहनी और हशमत। भारत-पाकिस्तान विभाजन पर लिखने वाले प्रमुख लेखकों में उनका नाम महत्वपूर्ण है।

उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ तत्समता, उर्दू का बाँकपन और पंजाबी की जिंदादिली मिलती है। वे पात्रों को उनकी बोली, तेवर और स्वभाव के साथ जीवित कर देती हैं।

मियाँ नसीरुद्दीन पाठ में भी यही विशेषता मिलती है। लेखिका ने एक खानदानी नानबाई को शब्दों से जीवंत बना दिया है। पाठ में भाषा, संवाद और चरित्र-चित्रण बहुत प्रभावशाली हैं।

Q2. मियाँ नसीरुद्दीन का चरित्र-चित्रण कीजिए।

मियाँ नसीरुद्दीन खानदानी नानबाई हैं। वे छप्पन किस्म की रोटियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हें अपने पेशे पर गहरा गर्व है और वे इसे केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि कला मानते हैं।

वे आत्मसम्मानी और थोड़े अक्खड़ स्वभाव के हैं। लेखिका के सवालों पर कभी वे हँसते हैं, कभी तरेरते हैं, कभी बेरुखी दिखाते हैं। फिर भी उनकी बातों में अनुभव और जीवन की गहरी समझ है।

वे मानते हैं कि हुनर काम से आता है, नसीहतों से नहीं। वे पहले बर्तन धोने, भट्टी बनाने और आँच देने जैसी तैयारी को जरूरी बताते हैं। इससे पता चलता है कि वे अभ्यास और मेहनत को महत्व देते हैं।

मियाँ नसीरुद्दीन पुराने कद्रदानों को याद करते हैं और आज के समय से थोड़ा निराश भी हैं। उनका चरित्र एक ऐसे कारीगर का है जो अपनी कला, परंपरा और मेहनत की असली कीमत जानता है।

Q3. मियाँ नसीरुद्दीन को नानबाइयों का मसीहा क्यों कहा गया है?

मियाँ नसीरुद्दीन को नानबाइयों का मसीहा इसलिए कहा गया है क्योंकि वे साधारण नानबाई नहीं हैं। वे खानदानी नानबाई हैं और छप्पन किस्म की रोटियाँ बनाने की कला जानते हैं। उनके लिए रोटी पकाना केवल खाना बनाना नहीं, बल्कि एक हुनर और कला है।

उनका परिवार पीढ़ियों से इस पेशे से जुड़ा रहा है। उनके वालिद मियाँ बरकत शाही और दादा मियाँ कल्लन मशहूर नानबाई थे। मियाँ नसीरुद्दीन ने भी यह कला अपने वालिद उस्ताद से सीखी।

वे अपने हुनर को बहुत गंभीरता से लेते हैं। उनका मानना है कि नानबाई बनने से पहले भट्टी, आँच, बर्तन और आटे की समझ जरूरी है। यही व्यावहारिक ज्ञान उन्हें दूसरों से अलग बनाता है।

उनके पास रोटियों की विविधता और बारीकी का ज्ञान है। बाकरखानी, शीरमाल, ताफतान, खमीरी, रूमाली और तुनकी जैसी रोटियों का उल्लेख उनके हुनर की गहराई को दिखाता है। इसलिए उन्हें नानबाइयों का मसीहा कहना उचित है।

Q4. “तालीम की तालीम भी बड़ी चीज़ होती है” कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

यह कथन मियाँ नसीरुद्दीन के व्यावहारिक जीवन-दर्शन को व्यक्त करता है। वे कहते हैं कि किसी काम को सीधे उसके अंतिम रूप में नहीं सीखा जा सकता। उसके पहले की तैयारी भी सीखनी होती है।

वे मदरसे का उदाहरण देते हैं। यदि कोई बच्चा कच्ची, पक्की और दूसरी कक्षा छोड़कर सीधे तीसरी में बैठ जाए, तो पहले की पढ़ाई का क्या होगा। इसी तरह यदि कोई बर्तन धोना, भट्टी बनाना और आँच देना न सीखे, तो वह सीधा नानबाई का हुनर कैसे सीख सकता है।

यहाँ “तालीम” का पहला अर्थ है हुनर की शिक्षा। दूसरी “तालीम” से आशय है उस शिक्षा की बुनियादी तैयारी। असली कारीगर बनने के लिए हर छोटे काम को समझना जरूरी है।

इस कथन से पाठ का बड़ा संदेश मिलता है। कोई भी कला मेहनत, अभ्यास, अनुशासन और आधारभूत ज्ञान के बिना नहीं आती।

Q5. मियाँ नसीरुद्दीन के संवादों से उनके स्वभाव की कौन-कौन सी विशेषताएँ सामने आती हैं?

मियाँ नसीरुद्दीन के संवाद उनके पूरे व्यक्तित्व को खोलते हैं। वे सीधे और बेबाक बोलते हैं। लेखिका को ग्राहक समझते हैं, फिर अखबारनवीस समझकर चुटकी लेते हैं। इससे उनका व्यंग्यपूर्ण स्वभाव दिखाई देता है।

उनमें अपने हुनर का गर्व है। जब लेखिका पूछती है कि रोटियाँ बनाने का इल्म कहाँ से मिला, तो वे उलटे सवाल करते हैं कि नानबाई अपना इल्म किसी नगीना-साज़ या रंगरेज़ से सीखेगा क्या। इससे उनकी पेशागत अस्मिता सामने आती है।

वे अनुभव को सबसे बड़ा गुरु मानते हैं। “काम करने से आता है, नसीहतों से नहीं” और “तालीम की तालीम भी बड़ी चीज़ होती है” जैसे कथन उनके जीवन-दर्शन को बताते हैं।

उनमें थोड़ी खीझ और बेरुखी भी है, खासकर जब उनसे बादशाह का नाम पूछा जाता है। पर यह खीझ भी उनके आत्मसम्मान और पुराने जमाने की याद से जुड़ी है। वे अपने समय, पेशे और कद्रदानों के घटते सम्मान से आहत हैं।

Q6. पाठ में पारंपरिक कला और बदलते समय का संघर्ष कैसे दिखाया गया है?

मियाँ नसीरुद्दीन पाठ में पारंपरिक कला और बदलते समय का संघर्ष बहुत साफ दिखाई देता है। मियाँ नसीरुद्दीन खानदानी नानबाई हैं। वे रोटी पकाने को कला मानते हैं और उसके हर चरण को महत्वपूर्ण समझते हैं।

उनके लिए भट्टी, आँच, आटा, मैदा और रोटी की बारीकी सब कला का हिस्सा हैं। वे छप्पन किस्म की रोटियाँ बनाने की बात करते हैं। इससे पता चलता है कि पुराने समय में खाने और पकाने दोनों की कद्र थी।

लेकिन अंत में वे कहते हैं कि अब वे कद्रदान चले गए जो पकाने-खाने की कद्र करना जानते थे। अब लोग तंदूर से रोटी निकालते हैं, निगलते हैं और हजम कर लेते हैं। यानी स्वाद, कला और मेहनत की सूक्ष्म समझ कम हो गई है।

इससे पाठ में बदलते समय की विडंबना सामने आती है। परंपरा और हुनर अभी मौजूद हैं, लेकिन उन्हें समझने और सम्मान देने वाले लोग कम होते जा रहे हैं।

Q7. मियाँ नसीरुद्दीन के अनुसार असली हुनर कैसे सीखा जाता है?

मियाँ नसीरुद्दीन के अनुसार असली हुनर काम करके सीखा जाता है। वह केवल नसीहत, बात या किताब से नहीं आता। इसे सीखने के लिए व्यक्ति को छोटे-छोटे कामों से शुरुआत करनी पड़ती है।

वे बताते हैं कि नानबाई बनने से पहले बर्तन धोना, भट्टी बनाना और भट्टी को आँच देना सीखना जरूरी है। यदि कोई इन शुरुआती चरणों को छोड़ दे, तो वह पूरा हुनर नहीं सीख सकता।

वे “तालीम की तालीम” की बात करते हैं। इसका अर्थ है कि कला सीखने से पहले उसकी तैयारी सीखना। यह बात केवल नानबाई के पेशे पर नहीं, हर कला और काम पर लागू होती है।

उनकी दृष्टि में हाथ का अभ्यास, धैर्य, अनुभव और परंपरा मिलकर असली हुनर बनाते हैं। यही पाठ का मुख्य जीवन-संदेश है।

Q8. मियाँ नसीरुद्दीन पाठ की भाषा-शैली की विशेषताएँ लिखिए।

मियाँ नसीरुद्दीन पाठ की भाषा जीवंत, संवादात्मक और शब्दचित्रात्मक है। कृष्णा सोबती ने मियाँ नसीरुद्दीन के बोलने के ढंग, तेवर, चुटीलेपन और गर्व को बहुत स्वाभाविक भाषा में प्रस्तुत किया है।

भाषा में हिंदी, उर्दू और बोलचाल के शब्द सहज रूप से आए हैं। जैसे अखबारनवीस, खुराफात, इल्म, वालिद, मरहूम, शागिर्द, तरेरा, रुखाई और तालीम जैसे शब्द पाठ को उसके माहौल से जोड़ते हैं।

लेखिका ने वर्णन से अधिक संवाद का सहारा लिया है। मियाँ नसीरुद्दीन के जवाबों से उनका चरित्र अपने-आप खुलता है। वे कभी तरेरते हैं, कभी हँसते हैं, कभी बेरुखी दिखाते हैं और कभी पुराने दिनों को याद करते हैं।

पाठ का शब्दचित्र बहुत प्रभावशाली है। मियाँ का पका चेहरा, काइयाँ भोलापन, पेशानी के तेवर और बीड़ी पीने का अंदाज़, सब मिलकर उन्हें पाठक के सामने जीवित कर देते हैं।

कथन-व्याख्या Class 11 Hindi Aroh Chapter 2

Q1. “काम करने से आता है, नसीहतों से नहीं।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

इस कथन में मियाँ नसीरुद्दीन का व्यावहारिक अनुभव बोलता है। वे मानते हैं कि कोई भी कला केवल सलाह सुनकर नहीं सीखी जा सकती। उसके लिए काम करना, गलती करना, अभ्यास करना और अनुभव लेना जरूरी है।

रोटी पकाने की कला में भी यही बात लागू होती है। आटा, आँच, भट्टी और हाथ की सफाई सब अभ्यास से आते हैं। इसलिए यह कथन पूरे पाठ का महत्वपूर्ण जीवन-संदेश है।

Q2. “रोटी जनाब पकती है आँच से, समझे!” का आशय स्पष्ट कीजिए।

इस कथन में मियाँ नसीरुद्दीन रोटी पकाने की वास्तविकता बताते हैं। वे झूठ, डींग या बनावटी बातों को नकारते हैं। उनके अनुसार रोटी आँच से पकती है, यानी असली काम ठोस मेहनत और सही प्रक्रिया से होता है।

यह कथन उनके पेशेवर आत्मविश्वास और व्यावहारिक बुद्धि को दिखाता है। वे कला को रहस्य नहीं, अभ्यास और मेहनत का परिणाम मानते हैं।

Q3. “उतर गए वे जमाने। और गए वे कद्रदान...” का भाव स्पष्ट कीजिए।

इस कथन में मियाँ नसीरुद्दीन की निराशा व्यक्त हुई है। वे कहते हैं कि पहले लोग पकाने और खाने की कद्र जानते थे। अब वह समय नहीं रहा।

आज लोग रोटी को जल्दी से तंदूर से निकालकर खा लेते हैं। स्वाद, मेहनत और कला को समझने वाले लोग कम हो गए हैं। यह कथन बदलते समय और परंपरागत कला की घटती कद्र को दिखाता है।

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FAQs (Frequently Asked Questions)

इस पाठ में एक खानदानी नानबाई मियाँ नसीरुद्दीन का शब्दचित्र है। उनके माध्यम से रोटी पकाने की कला, पेशे का गर्व, अनुभव और पारंपरिक हुनर की कद्र पर बात की गई है।

वे केवल घमंडी नहीं हैं। उनमें अपने हुनर का गर्व और आत्मसम्मान है। उनका स्वभाव अक्खड़ जरूर है, लेकिन वह उनके अनुभव, कला और खानदानी पेशे से जुड़ा है।

क्योंकि किसी भी कला को सीखने से पहले उसकी बुनियादी तैयारी सीखनी पड़ती है। नानबाई बनने से पहले बर्तन, भट्टी और आँच का ज्ञान जरूरी है। यही “तालीम की तालीम” है।

मियाँ नसीरुद्दीन मानते हैं कि अब लोग पकाने और खाने की बारीकियों की कद्र नहीं करते। पहले लोग कला और स्वाद समझते थे। अब लोग जल्दी खाकर आगे बढ़ जाते हैं।

इस अध्याय से कृष्णा सोबती का जीवन, मियाँ नसीरुद्दीन का चरित्र-चित्रण, नानबाइयों का मसीहा, तालीम की तालीम, रोटी की कला, कारीगरों की मजदूरी and भाषा-शैली पर प्रश्न आ सकते हैं।