Class 11 Hindi Vitan Chapter 2 Important Questions राजस्थान की रजत बूँदें
Class 11 Hindi Vitan Chapter 2 introduces students to Rajasthan’s traditional water wisdom through the system of कुई. The chapter helps students understand मरुभूमि, रेजाणीपानी, चेजारो का कौशल, सामुदायिक जल-संरक्षण and local environmental knowledge.
अनुपम मिश्र द्वारा लिखित राजस्थान की रजत बूँदें जल-संरक्षण पर आधारित एक महत्वपूर्ण पाठ है। इसमें राजस्थान की मरुभूमि में पानी बचाने की पारंपरिक तकनीक कुई का वर्णन है। यह पाठ बताता है कि जहाँ वर्षा कम होती है और भूजल खारा होता है, वहाँ समाज ने अनुभव और श्रम से मीठे पानी को बचाने का अद्भुत तरीका विकसित किया।
Class 11 Hindi Vitan Chapter 2 Important Questions छात्रों को कुई, रेजाणीपानी, पालरपानी, पातालपानी, खड़िया पट्टी, चेजारो और ग्राम समाज की भूमिका को समझने में मदद करते हैं। यह अध्याय केवल जल-संग्रह की तकनीक नहीं बताता, बल्कि यह भी दिखाता है कि प्रकृति, समाज और परंपरागत ज्ञान कैसे मिलकर जीवन बचाते हैं।
Key Takeaways
- कुई: बहुत छोटे व्यास वाला गहरा जल-संग्रह ढाँचा, जो वर्षा से बनी नमी को बूंदों में बदलकर पानी देता है।
- रेजाणीपानी: धरातल से नीचे उतरा, लेकिन पातालपानी में न मिला पानी।
- खड़िया पट्टी: यह वर्षा के पानी को खारे भूजल में मिलने से रोकती है।
- चेजारो: कुई खोदने और उसकी विशेष चिनाई करने वाले कुशल कारीगर।
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Revise the chapter in three parts:
- First 10 minutes: कुई, कुआँ, खड़िया पट्टी and मरुभूमि की रेत
- Next 10 minutes: पालरपानी, पातालपानी, रेजाणीपानी and चेजारो का काम
- Final 10 minutes: कुई का छोटा मुँह, ग्राम समाज का नियंत्रण and जल-संरक्षण का संदेश
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अति लघु उत्तरीय प्रश्न Class 11 Hindi Vitan Chapter 2 Important Questions
इन प्रश्नों में एक-दो वाक्य में उत्तर लिखें। उत्तर सीधे और तथ्यात्मक रखें।
Q1. राजस्थान की रजत बूँदें पाठ के लेखक कौन हैं?
राजस्थान की रजत बूँदें पाठ के लेखक अनुपम मिश्र हैं।
Q2. इस पाठ में किस पारंपरिक जल-संरचना का वर्णन है?
इस पाठ में राजस्थान की पारंपरिक जल-संरचना कुई का वर्णन है।
Q3. कुई क्या होती है?
कुई बहुत छोटे व्यास वाला गहरा जल-संग्रह ढाँचा है। यह वर्षा से बनी नमी को बूंद-बूंद पानी में बदलकर जमा करती है।
Q4. कुआँ और कुई में मुख्य अंतर क्या है?
कुआँ भूजल पाने के लिए बनाया जाता है, जबकि कुई सीधे भूजल से नहीं जुड़ती। कुई रेत में सुरक्षित वर्षा-नमी से पानी जुटाती है।
Q5. कुई खोदने वाले कुशल लोगों को क्या कहा जाता है?
कुई खोदने और चिनाई करने वाले कुशल लोगों को चेजारो कहा जाता है।
Q6. बसौली क्या होती है?
बसौली छोटे फावड़े जैसा औज़ार है। इसका नुकीला फल लोहे का और हत्था लकड़ी का होता है।
Q7. पानी के तीन रूप कौन-कौन से बताए गए हैं?
पानी के तीन रूप हैं — पालरपानी, पातालपानी और रेजाणीपानी।
Q8. पालरपानी किसे कहते हैं?
सीधे वर्षा से मिलने वाले पानी को पालरपानी कहते हैं। यह धरातल पर बहता है और नदी, तालाब आदि में रोका जाता है।
Q9. पातालपानी किसे कहते हैं?
कुओं से निकाले जाने वाले भूजल को पातालपानी कहते हैं।
Q10. रेजाणीपानी क्या है?
धरातल से नीचे उतरा, लेकिन पातालपानी में न मिल पाया पानी रेजाणीपानी कहलाता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न 2 अंक Class 11 Hindi Vitan Chapter 2 Important Questions
इन प्रश्नों में दो से तीन पंक्तियों में उत्तर लिखें। उत्तर में पाठ का मुख्य विचार साफ होना चाहिए।
Q1. कुई को छोटा कुआँ क्यों कहा जा सकता है?
कुई आकार में कुएँ जैसी होती है, पर उसका व्यास बहुत छोटा होता है। उसकी गहराई कुएँ से कम नहीं होती, लेकिन वह भूजल से सीधे नहीं जुड़ती। इसलिए उसे छोटा कुआँ कहा जा सकता है, पर उसका काम अलग है।
Q2. मरुभूमि में बड़े कुओं का पानी प्रायः पीने योग्य क्यों नहीं होता?
मरुभूमि में बड़े कुओं का पानी डेढ़ सौ-दो सौ हाथ गहराई पर मिलता है। यह पानी प्रायः खारा होता है। इसलिए वह पीने के काम में नहीं आ सकता।
Q3. खड़िया पट्टी का क्या काम है?
खड़िया पट्टी वर्षा के जल को नीचे जाकर खारे पातालपानी में मिलने से रोकती है। इस कारण पानी रेत और पट्टी के बीच नमी के रूप में सुरक्षित रहता है।
Q4. मरुभूमि में धरती पर दरारें क्यों नहीं पड़तीं?
मरुभूमि में रेत के कण एक-दूसरे से चिपकते नहीं। पानी गिरने पर वे भारी तो होते हैं, पर अपनी जगह नहीं छोड़ते। इसलिए धरती में दरारें नहीं पड़तीं और भीतर की नमी सुरक्षित रहती है।
Q5. चेलवांजी कुई के भीतर पसीने में तरबतर क्यों हो जाते हैं?
कुई की खुदाई तीस-पैंतीस हाथ या उससे अधिक गहराई तक होती है। अंदर गर्मी बढ़ती जाती है और हवा कम होती जाती है। इसी कारण चेलवांजी पसीने में तरबतर हो जाते हैं।
Q6. कुई की गहराई में हवा पहुँचाने के लिए क्या किया जाता है?
ऊपर खड़े लोग मुट्ठी भर रेत जोर से नीचे फेंकते हैं। इससे ऊपर की ताज़ी हवा नीचे जाती है और नीचे की घुटन भरी गर्म हवा ऊपर लौटती है।
Q7. चेलवांजी सिर पर धातु का बर्तन क्यों पहनते हैं?
ऊपर से फेंकी जाने वाली रेत, कंकड़ या पत्थर नीचे काम कर रहे चेलवांजी के सिर पर गिर सकते हैं। उनसे बचने के लिए वे धातु का बर्तन टोपी की तरह पहनते हैं।
Q8. कुई की सफलता किस अवसर में बदल जाती है?
जब खड़िया पत्थर की पट्टी आ जाती है और कुई में पानी मिलने की संभावना स्पष्ट हो जाती है, तो कुई की सफलता उत्सव का अवसर बन जाती है। चेजारो को विदाई पर भेंट भी दी जाती थी।
लघु उत्तरीय प्रश्न 3 अंक राजस्थान की रजत बूँदें Question Answer
इन प्रश्नों में विचार, प्रक्रिया और सामाजिक संदर्भ को थोड़ा विस्तार दें।
Q1. कुई और कुएँ में अंतर स्पष्ट कीजिए।
कुआँ भूजल तक पहुँचने के लिए बनाया जाता है। उसमें नीचे से पातालपानी मिलता है। लेकिन मरुभूमि में यह पानी प्रायः खारा होता है, इसलिए पीने योग्य नहीं रहता।
कुई भूजल से सीधे नहीं जुड़ती। वह रेत में सुरक्षित वर्षा-नमी को बूंद-बूंद पानी में बदलती है। उसका व्यास छोटा होता है, पर गहराई काफी होती है। इस तरह कुई मरुभूमि के लिए अलग और उपयोगी जल-प्रणाली है।
Q2. रेजाणीपानी को पानी का तीसरा रूप क्यों कहा गया है?
पाठ में पानी को तीन रूपों में बाँटा गया है। पालरपानी वह है जो सीधे वर्षा से मिलता है और धरातल पर बहता है। पातालपानी वह है जो कुओं से निकाला जाता है।
इन दोनों के बीच का पानी रेजाणीपानी है। यह धरातल से नीचे उतरता है, लेकिन खड़िया पट्टी के कारण पाताल में नहीं मिल पाता। यही पानी कुई में बूंद-बूंद जमा होता है। इसलिए इसे पानी का तीसरा रूप कहा गया है।
Q3. मरुभूमि की रेत पानी को बचाने में कैसे सहायक होती है?
मरुभूमि की रेत के कण बहुत बारीक होते हैं, पर वे एक-दूसरे से चिपकते नहीं। पानी गिरने पर वे थोड़ा भारी हो जाते हैं, पर अपनी जगह बनाए रखते हैं। इसलिए धरती पर दरारें नहीं पड़तीं।
जब दरारें नहीं पड़तीं, तो भीतर की नमी भाप बनकर जल्दी बाहर नहीं निकलती। नीचे खड़िया पट्टी और ऊपर रेत के कण, दोनों मिलकर वर्षा-जल की रक्षा करते हैं। इसी कारण कुई में पानी जमा हो पाता है।
Q4. कुई बनाना एक विशिष्ट कला क्यों है?
कुई का व्यास चार-पाँच हाथ का होता है, पर उसकी गहराई तीस से साठ-पैंसठ हाथ तक हो सकती है। इतनी संकरी और गहरी जगह में खुदाई करना बहुत कठिन होता है।
चेजारो को मिट्टी की परख, चिनाई, हवा की कमी, गर्मी, गिरते कंकड़ और मिट्टी धँसने के खतरे का ध्यान रखना पड़ता है। थोड़ी-सी चूक उनके प्राण ले सकती है। इसलिए कुई बनाना सचमुच एक विशिष्ट कला है।
Q5. कुई को रस्से से बाँधने की प्रक्रिया क्या है?
कुछ जगहों पर ईंट की चिनाई से मिट्टी को रोकना संभव नहीं होता। ऐसे में कुई को खींप घास से बने मोटे रस्से से बाँधा जाता है। पहले दिन खींप घास जमा की जाती है और उससे रस्सा बनाया जाता है।
खुदाई के साथ रस्से की कुंडलियाँ दीवार से सटाकर नीचे जमाई जाती हैं। अगले दिन खुदाई आगे बढ़ती है और रस्से की कुंडली नीचे खिसकाई जाती है। इस तरह रस्सा मिट्टी को रोकने और कुई को संभालने का काम करता है।
Q6. कुई का मुँह छोटा क्यों रखा जाता है?
कुई में पानी धीरे-धीरे बूंदों के रूप में जमा होता है। यदि उसका व्यास बड़ा होगा, तो कम पानी अधिक फैल जाएगा और उसे निकालना कठिन होगा। छोटे व्यास में थोड़ा पानी भी ऊपर तक कुछ ऊँचाई ले लेता है।
दूसरा कारण यह है कि बड़े मुँह से पानी भाप बनकर जल्दी उड़ सकता है। तीसरा कारण सफाई और सुरक्षा है। छोटे मुँह को ढकना आसान होता है, इसलिए पानी सुरक्षित रहता है।
Q7. निजी होते हुए भी कुई पर ग्राम समाज का अंकुश क्यों रहता है?
हर कुई किसी व्यक्ति या परिवार की हो सकती है, लेकिन वह जिस क्षेत्र में बनती है, वह गाँव-समाज की सार्वजनिक जमीन होती है। उस क्षेत्र में बरसी नमी से ही साल भर कुई में पानी आता है।
नई कुई बनने का अर्थ है पहले से तय नमी का नया बँटवारा। यदि हर कोई अपनी इच्छा से कुई बनाए, तो पानी की मात्रा घट सकती है। इसलिए निजी कुई पर भी ग्राम समाज का नियंत्रण रहता है।
Q8. चेजारो के प्रति गाँव समाज का व्यवहार पहले कैसा था और अब क्या बदलाव आया है?
पहले कुई बनाने वाले चेजारो का विशेष सम्मान किया जाता था। काम पूरा होने पर भोज होता था, विदाई के समय भेंट दी जाती थी और तीज-त्योहार, विवाह और फसल आने पर भी उन्हें नेग मिलता था।
अब यह संबंध बदल गया है। कई जगह केवल मजदूरी देकर काम करवाने का रिवाज आ गया है। इससे पारंपरिक सामाजिक सम्मान की जगह आर्थिक लेन-देन अधिक प्रमुख हो गया है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 5 अंक Class 11 Hindi Vitan Chapter 2
इन प्रश्नों में पाठ की प्रक्रिया, सामाजिक व्यवस्था और जल-संरक्षण का संदेश साथ लेकर उत्तर लिखें।
Q1. राजस्थान की रजत बूँदें पाठ का सार लिखिए।
राजस्थान की रजत बूँदें पाठ में अनुपम मिश्र ने राजस्थान की मरुभूमि में पानी बचाने की अद्भुत लोक-प्रणाली कुई का वर्णन किया है। मरुभूमि में वर्षा कम होती है और बड़े कुओं का पानी प्रायः खारा होता है। ऐसे में लोगों ने रेत में सुरक्षित वर्षा-नमी से मीठा पानी प्राप्त करने का तरीका विकसित किया।
कुई बहुत छोटे व्यास वाला गहरा ढाँचा है। यह सीधे भूजल से नहीं जुड़ती। रेत के नीचे जहाँ खड़िया पत्थर की पट्टी होती है, वहाँ वर्षा का पानी नीचे खारे पातालपानी में नहीं मिल पाता। वह रेत और पट्टी के बीच नमी के रूप में रह जाता है।
कुई का खाली पेट इस नमी को बूंदों में बदलता है। इस तरह खारे पानी के सागर में अमृत जैसा मीठा पानी मिल जाता है। इसे पाने के लिए चेजारो बहुत कठिन और जोखिम भरा काम करते हैं।
पाठ में पालरपानी, पातालपानी और रेजाणीपानी का अंतर भी बताया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि कुई निजी होने पर भी ग्राम समाज के नियंत्रण में रहती है, क्योंकि पानी सामुदायिक संपत्ति है। पाठ जल-संरक्षण और लोक-बुद्धि का सुंदर उदाहरण है।
Q2. कुई की रचना और उपयोगिता का विस्तार से वर्णन कीजिए।
कुई मरुभूमि में मीठा पानी प्राप्त करने की पारंपरिक संरचना है। इसका व्यास बहुत छोटा होता है, सामान्यतः चार-पाँच हाथ के आसपास, लेकिन इसकी गहराई तीस से साठ-पैंसठ हाथ तक हो सकती है।
कुई भूजल तक पहुँचने के लिए नहीं बनाई जाती। यह रेत में जमा वर्षा-नमी को पानी में बदलकर संचित करती है। जहाँ रेत के नीचे खड़िया पट्टी होती है, वहाँ वर्षा का पानी नीचे खारे भूजल में नहीं मिलता। वही नमी कुई में बूंद-बूंद रिसती है।
कुई का मुँह छोटा रखा जाता है ताकि कम पानी भी ऊँचाई ले सके, भाप बनकर न उड़े और उसे ढककर सुरक्षित रखा जा सके। कई कुइयों पर ढक्कन, ताले, चरखी या फरेड़ी भी लगाई जाती है।
इस प्रकार कुई मरुभूमि में जीवन बचाने वाली जल-प्रणाली है। वह कम वर्षा वाले क्षेत्र में भी मीठा पानी उपलब्ध कराती है।
Q3. पालरपानी, पातालपानी और रेजाणीपानी का अंतर स्पष्ट कीजिए।
पाठ में पानी को तीन रूपों में बाँटा गया है। पहला रूप है पालरपानी। यह सीधे वर्षा से मिलने वाला पानी है। यह धरातल पर बहता है और नदी, तालाब आदि में रोका जाता है।
दूसरा रूप है पातालपानी। यह भूजल है, जो कुओं से निकाला जाता है। मरुभूमि में यह पानी प्रायः खारा हो सकता है, इसलिए पीने योग्य नहीं रहता।
तीसरा रूप है रेजाणीपानी। यह वह पानी है जो धरातल से नीचे उतरता है, लेकिन पातालपानी में नहीं मिल पाता। खड़िया पट्टी इसे नीचे जाने से रोकती है। यही पानी रेत में नमी के रूप में रहता है और कुई में बूंदों के रूप में जमा होता है।
इन तीन रूपों की समझ बताती है कि मरुभूमि समाज ने पानी को केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि गहरे अनुभव और विज्ञान से समझा था।
Q4. खड़िया पट्टी और रेत की भूमिका कुई में कैसे महत्वपूर्ण है?
कुई की सफलता में खड़िया पट्टी और रेत दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। खड़िया पट्टी रेत के नीचे फैली होती है। यह वर्षा के पानी को नीचे जाकर खारे पातालपानी में मिलने से रोकती है।
रेत के कण भी पानी बचाने में सहायक हैं। वे बारीक होते हैं, पर एक-दूसरे से चिपकते नहीं। पानी गिरने पर वे भारी हो जाते हैं, पर अपनी जगह नहीं छोड़ते। इसलिए धरती में दरारें नहीं पड़तीं।
दूसरी मिट्टी में दरारें पड़ने पर नमी भाप बनकर उड़ सकती है। पर मरुभूमि की रेत नमी को भीतर सुरक्षित रखती है। नीचे खड़िया पट्टी और ऊपर रेत का पहरा मिलकर पानी को बचाए रखते हैं।
इसी नमी को कुई अपने भीतर बूंद-बूंद संचित करती है। इसलिए खड़िया पट्टी और रेत कुई की जीवन-रेखा हैं।
Q5. चेजारो का काम कठिन, जोखिम भरा और सम्माननीय क्यों है?
चेजारो वे कुशल लोग होते हैं जो कुई की खुदाई और विशेष चिनाई करते हैं। यह काम बहुत कठिन है क्योंकि कुई का व्यास बहुत छोटा और गहराई बहुत अधिक होती है। संकरी जगह में कुल्हाड़ी या फावड़ा नहीं चल सकता, इसलिए बसौली से खुदाई की जाती है।
गहराई बढ़ने पर गर्मी और हवा की कमी बढ़ती जाती है। ऊपर से रेत और कंकड़ गिरने का खतरा रहता है। मिट्टी धँसने का भी डर होता है। थोड़ी-सी गलती चेजारो के प्राण ले सकती है।
उन्हें मिट्टी की परख भी होनी चाहिए। खड़िया पत्थर की पट्टी आते ही उन्हें काम रोकना होता है। चिनाई, रस्से से बाँधना या लकड़ी के लट्ठों से संरचना बनाना भी उनके कौशल का हिस्सा है।
पहले गाँव समाज चेजारो का बहुत सम्मान करता था। काम पूरा होने पर भोज और भेंट दी जाती थी। इससे स्पष्ट है कि उनका काम केवल मजदूरी नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाली कला था।
Q6. कुई का छोटा मुँह उसके उपयोग से कैसे जुड़ा है?
कुई का मुँह छोटा रखना केवल आकार की बात नहीं, बल्कि उपयोग की जरूरत है। कुई में पानी बहुत धीरे-धीरे रिसकर आता है। एक दिन में कई बार केवल दो-तीन घड़े पानी ही जमा हो पाता है।
यदि कुई का मुँह बड़ा होगा, तो कम मात्रा का पानी अधिक फैल जाएगा और उसे निकालना कठिन होगा। छोटे व्यास में पानी दो-चार हाथ की ऊँचाई ले लेता है और उसे चड़स या बाल्टी से निकाला जा सकता है।
छोटे मुँह से पानी की भाप कम उड़ती है। उसे ढकना भी आसान होता है। इससे पानी साफ और सुरक्षित रहता है। कई जगह ढक्कन पर ताले भी लगाए जाते हैं।
इस तरह कुई का छोटा मुँह मरुभूमि की जल-जरूरत और जल-संरक्षण की समझ से जुड़ा है।
Q7. “निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में कुई पर ग्राम समाज का अंकुश रहता है” — स्पष्ट कीजिए।
कुई किसी परिवार की निजी हो सकती है। उसे बनाने और उससे पानी लेने का अधिकार उस परिवार का होता है। लेकिन कुई जिस जमीन पर बनती है, वह गाँव की सार्वजनिक जमीन होती है।
उस क्षेत्र में जो वर्षा होती है, वही रेत में नमी बनकर सुरक्षित रहती है। उसी नमी से साल भर कुई में पानी भरता है। यदि उसी क्षेत्र में बहुत सारी नई कुइयाँ बना दी जाएँ, तो पहले से तय नमी कई हिस्सों में बँट जाएगी।
इसलिए नई कुई बनाना केवल निजी निर्णय नहीं हो सकता। ग्राम समाज जरूरत देखकर अनुमति देता है। इससे पानी का न्यायपूर्ण उपयोग और सामुदायिक नियंत्रण बना रहता है।
यह बात बताती है कि राजस्थान की जल-परंपरा में पानी को केवल निजी संपत्ति नहीं माना गया। उसे समाज और प्रकृति से जुड़ी सामूहिक जिम्मेदारी माना गया।
Q8. राजस्थान की रजत बूँदें पाठ आज के जल-संकट में क्यों प्रासंगिक है?
आज पानी की समस्या लगातार बढ़ रही है। कई स्थानों पर भूजल घट रहा है और जल-स्रोत सूख रहे हैं। ऐसे समय में राजस्थान की रजत बूँदें पाठ बहुत प्रासंगिक है, क्योंकि यह पारंपरिक जल-ज्ञान का महत्व समझाता है।
पाठ दिखाता है कि कम वर्षा वाले मरुभूमि क्षेत्र में भी समाज ने पानी को बचाने के तरीके विकसित किए। उन्होंने रेत, खड़िया पट्टी, नमी और वर्षा के व्यवहार को समझकर कुई जैसी प्रणाली बनाई।
यह पाठ हमें सिखाता है कि पानी को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि सामूहिक संपत्ति मानना चाहिए। ग्राम समाज का नियंत्रण, जरूरत के अनुसार उपयोग और जल-संरक्षण की परंपरा आज भी उपयोगी है।
आज के जल-संकट में वर्षा जल-संग्रह, स्थानीय जल-संरचनाओं का पुनर्जीवन और सामुदायिक भागीदारी बहुत जरूरी है। इस दृष्टि से यह पाठ हमें पुरानी लोक-बुद्धि से सीखने की प्रेरणा देता है।
कथन-व्याख्या Class 11 Hindi Vitan Chapter 2
Q1. “खारे पानी के सागर में अमृत जैसा मीठा पानी।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
मरुभूमि में भूजल प्रायः खारा होता है। बड़े कुओं से मिलने वाला पानी पीने योग्य नहीं रहता। ऐसे क्षेत्र में कुई वर्षा की सुरक्षित नमी से मीठा पानी देती है।
इसलिए लेखक ने कुई के पानी को खारे पानी के सागर में अमृत जैसा मीठा पानी कहा है। यह मरुभूमि के जीवन के लिए बहुत मूल्यवान है।
Q2. “यहाँ बिखरे रहने में ही संगठन है।” इस कथन का भाव स्पष्ट कीजिए।
यह कथन मरुभूमि की रेत के संदर्भ में है। रेत के कण एक-दूसरे से चिपकते नहीं। वे अलग-अलग रहते हैं, पर यही अलगाव नमी को बचाने में मदद करता है।
दूसरी मिट्टी की तरह उनमें दरारें नहीं पड़तीं। इस तरह उनका बिखरापन ही पानी की रक्षा का कारण बनता है। यही इस कथन का भाव है।
Q3. “कुई हर दिन सोने का एक अंडा देने वाली मुर्गी की कहानी को जमीन पर उतारती है।” इसका अर्थ लिखिए।
कुई एक दिन में बहुत अधिक पानी नहीं देती। वह धीरे-धीरे दो-तीन घड़े मीठा पानी देती है। यह पानी मरुभूमि में बहुत मूल्यवान होता है।
जैसे कहानी में मुर्गी रोज़ सोने का एक अंडा देती है, वैसे ही कुई रोज़ थोड़ा-थोड़ा अमूल्य पानी देती है। इसलिए इस कथन में कुई की महत्ता समझाई गई है।
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FAQs (Frequently Asked Questions)
इस पाठ में राजस्थान की मरुभूमि में पानी बचाने की पारंपरिक प्रणाली कुई का वर्णन है। इसमें रेजाणीपानी, खड़िया पट्टी, चेजारो और ग्राम समाज की जल-समझ को बताया गया है।
कुआँ भूजल तक पहुँचता है, जबकि कुई वर्षा से बनी नमी को बूंद-बूंद पानी में बदलती है। कुई का व्यास छोटा और गहराई अधिक होती है।
रेजाणीपानी धरातल से नीचे उतरा पानी है जो पातालपानी में नहीं मिला। यही पानी कुई में बूंदों के रूप में जमा होकर मीठा पानी देता है।
कुई निजी हो सकती है, लेकिन वह सार्वजनिक क्षेत्र की नमी से पानी पाती है। नई कुई बनने से नमी का बँटवारा होता है। इसलिए ग्राम समाज उस पर नियंत्रण रखता है।
इस अध्याय से कुई और कुएँ का अंतर, पालरपानी-पातालपानी-रेजाणीपानी, खड़िया पट्टी, चेजारो, कुई का छोटा मुँह, ग्राम समाज का नियंत्रण and जल-संरक्षण पर प्रश्न आ सकते हैं।