Important Questions Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 10 णमो अरिहन्ताणम्

णमो अरिहन्ताणम् is a Class 9 Sanskrit Sharada chapter on ऋषभदेव, the first Jain तीर्थङ्कर, and the values of अहिंसा, अपरिग्रह and spiritual discipline.
For CBSE 2026-27 Class 9 Sanskrit exams, this chapter supports practice in अपठित-अवबोधनम्, रचनात्मक-कार्यम्, अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् and पठित-अवबोधनम्.

राजा नाभि और मरुदेवी के पुत्र ऋषभदेव सर्वगुणसम्पन्न, अधीतविद्य और राजनीतिज्ञ थे। राज्य मिलने के बाद उन्होंने दुर्भिक्ष, आलस्य, उत्पादनक्षमता की कमी और जनों में विद्वेष जैसी समस्याओं का समाधान किया। बाद में नृत्यांगना की आकस्मिक मृत्यु देखकर उनका मन संसार की अनित्यता पर विचार करता है, और वे राज्य त्यागकर परमसत्य की खोज में निकलते हैं। Important Questions Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 10 विद्यार्थियों को ऋषभदेव के शासन, जीवन-परिवर्तन, केवलज्ञान, नवकारमन्त्र, पञ्चमहाव्रत, समास, सन्धि और वाच्यपरिवर्तन के अभ्यास के लिए तैयार करते हैं।

Key Takeaways

  • Chapter focus: णमो अरिहन्ताणम् Class 9 ऋषभदेव के राजधर्म, त्याग, तप, केवलज्ञान और जैन सिद्धान्तों को समझाता है।
  • Main figure: ऋषभदेव जैनसम्प्रदाय के प्रथम तीर्थङ्कर और आदिनाथ के रूप में प्रसिद्ध हैं।
  • Core values: पाठ में अहिंसा, अनेकान्तवाद, स्याद्वाद, अपरिग्रह, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र आते हैं।
  • Grammar value: Class 9 Sanskrit grammar practice में इस पाठ से समास, सन्धि, वाच्यपरिवर्तन, शब्दार्थ और प्राकृत-संस्कृत तुलना पूछी जा सकती है।

Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 10 Exam Pattern 2026-27

Section Question Area Marks
A अपठित-अवबोधनम् 10
B रचनात्मक-कार्यम् 15
C अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् 25
D पठित-अवबोधनम् 30

Section A: अपठित-अवबोधनम् – 10 Marks

अपठित-अवबोधनम् में अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग, तप, तीर्थङ्कर और नवकारमन्त्र से जुड़ा गद्यांश आ सकता है। णमो अरिहन्ताणम् word meanings ऐसे प्रश्नों में सहायक हैं।

Q1. अधोलिखितम् अपठितगद्यांशं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत।

ऋषभदेवः जैनसम्प्रदायस्य प्रथमः तीर्थङ्करः आसीत्। सः प्रजानां सुखाय विविधाः योजनाः रचितवान्। कृषिकार्यं, वस्त्रनिर्माणं, भोजननिर्माणं, पशुपालनं च जनान् प्रशिक्षितवान्। पश्चात् संसारस्य अनित्यतां ज्ञात्वा सः राज्यं परित्यज्य तपः आचरितवान्। कठोरतपसा सः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।

प्रश्नः: ऋषभदेवः कस्य प्रथमः तीर्थङ्करः आसीत्?
उत्तरम्: ऋषभदेवः जैनसम्प्रदायस्य प्रथमः तीर्थङ्करः आसीत्।

यह उत्तर गद्यांश की पहली पंक्ति से मिलता है। पाठ में उन्हें आदिनाथ भी कहा गया है।

Q2. ऋषभदेवः प्रजानां सुखाय किं रचितवान्?

ऋषभदेवः प्रजानां सुखाय विविधाः योजनाः रचितवान्।

यह पाठ के राजधर्म भाग से जुड़ा है। उन्होंने मूल समस्याओं के समाधान के लिए व्यावहारिक योजनाएँ बनाईं।

Q3. ऋषभदेवः जनान् केषु कार्येषु प्रशिक्षितवान्?

ऋषभदेवः जनान् कृषिकार्ये, वस्त्रनिर्माणे, भोजननिर्माणे, पशुपालने च प्रशिक्षितवान्।

इन जीवनकौशलों से जनता सक्रिय हुई। राज्य फिर से सुभिक्ष और व्यवस्थित बना।

Q4. संसारस्य अनित्यतां ज्ञात्वा ऋषभदेवः किं कृतवान्?

संसारस्य अनित्यतां ज्ञात्वा ऋषभदेवः राज्यं परित्यज्य तपः आचरितवान्।

नर्तकी की मृत्यु ने उनके मन में जीवन और स्थिर सुख पर प्रश्न जगाए। यह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था।

Q5. गद्यांशात् एकं क्तवतु-प्रत्ययान्तपदं लिखत।

क्तवतु-प्रत्ययान्तपदम् — रचितवान्।

“रचितवान्” भूतकाल का रूप है। इसका अर्थ है रचा या बनाया।

Section B: रचनात्मक-कार्यम् – 15 Marks

रचनात्मक-कार्यम् में पत्र, वाक्य-रचना, अनुवाद और मूल्य-आधारित लेखन पूछा जा सकता है। Important Questions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 10 में अहिंसा, तप, तीर्थङ्कर, अपरिग्रह और नवकारमन्त्र अच्छे लेखन-विषय हैं।

Q6. मञ्जूषायाः साहाय्येन पत्रस्य रिक्तस्थानानि पूरयत।

मञ्जूषा: ऋषभदेवः, विद्यालये, अहिंसा, तीर्थङ्करः, नमः

प्रिय मित्र,
सप्रेम ______। अद्य अस्माकं ______ आचार्यः जैनधर्मविषये पाठं पाठितवान्। ______ जैनसम्प्रदायस्य प्रथमः ______ आसीत्। पाठे ______ परमो धर्मः इति मूल्यं अपि ज्ञातम्।
तव मित्रम्
आरवः

उत्तरम्: नमः, विद्यालये, ऋषभदेवः, तीर्थङ्करः, अहिंसा।

यह पत्र Chapter 10 के मुख्य पात्र और मूल्य पर आधारित है। इसमें ऋषभदेव, तीर्थङ्कर और अहिंसा जैसे प्रमुख शब्द आते हैं।

Q7. “अहिंसा” इति विषयम् आधृत्य पञ्च संस्कृतवाक्यानि लिखत।

अहिंसा परमो धर्मः अस्ति।
मनसा वाचा कर्मणा च अहिंसा पालनीया।
जैनधर्मे अहिंसायाः महत्त्वं विशालम् अस्ति।
सर्वेषु प्राणिषु दया कर्तव्या।
अहिंसा समाजे शान्तिं जनयति।

ये वाक्य Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 10 important questions में लेखन अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।

Q8. “अपरिग्रहः” शब्देन द्वे संस्कृतवाक्ये लिखत।

अपरिग्रहः जैनधर्मस्य प्रमुखः सिद्धान्तः अस्ति।
आवश्यकात् अधिकः संग्रहः न करणीयः।

अपरिग्रह का अर्थ है आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना। पाठ इसे जैनमत के प्रमुख सिद्धान्तों में रखता है।

Q9. हिन्दी वाक्यस्य संस्कृते अनुवादं कुरुत: ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर थे।

ऋषभदेवः प्रथमः तीर्थङ्करः आसीत्।

यह वाक्य पाठ के निष्कर्ष से जुड़ा है। ऋषभदेव को आदिमः तीर्थङ्करः और आदिनाथः कहा गया है।

Q10. हिन्दी वाक्यस्य संस्कृते अनुवादं कुरुत: अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है।

अहिंसा परमो धर्मः अस्ति।

यह जैनधर्म का प्रमुख सिद्धान्त है। पाठ में मनसा, वाचा और कर्मणा अहिंसा पालन का उल्लेख आता है।

Q11. “नवकारमन्त्रः” शब्देन एकं संस्कृतवाक्यं रचयत।

नवकारमन्त्रः जैनानां परमपावनः मन्त्रः अस्ति।

इस मन्त्र में अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सर्वसाधुओं को प्रणाम किया जाता है। इसे णमोकारमन्त्र भी कहा जाता है।

Q12. “केवलज्ञानम्” शब्देन एकं संस्कृतवाक्यं लिखत।

ऋषभदेवः कठोरतपसा केवलज्ञानं प्राप्तवान्।

यह वाक्य पाठ के आध्यात्मिक भाग से जुड़ा है। प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ।

Section C: अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् – 25 Marks

अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् में Class 9 Sanskrit sandhi practice, समास, वाच्यपरिवर्तन और शब्दार्थ पूछे जा सकते हैं। इस पाठ में “इत्यतः”, “तथैव”, “देवस्यापि”, “प्रस्थितोऽयम्” जैसे सन्धि-पद और “मूलसमस्याः”, “ब्राह्मीलिपिः”, “विधिलिखितम्” जैसे समस्तपद महत्त्वपूर्ण हैं।

Q13. “इत्यतः” इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।

इति + अतः = इत्यतः।

यहाँ इति और अतः के संयोग से “इत्यतः” रूप बनता है। पाठ में ऐसे सन्धि-पद व्याकरण अभ्यास में उपयोगी हैं।

Q14. “चेत्यादीनि” इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।

च + इत्यादीनि = चेत्यादीनि।

यह रूप सूची के अन्त में आता है। इसका अर्थ है “और आदि”।

Q15. “देवस्यापि” इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।

देवस्य + अपि = देवस्यापि।

यहाँ अ + अ का संयोग दीर्घ आ बनाता है। इसका भाव है “देव का भी”।

Q16. “तथैव” इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।

तथा + एव = तथैव।

यह सन्धि पाठ्य-अभ्यास में दी गई है। इसका अर्थ है “वैसे ही”।

Q17. “प्रस्थितोऽयम्” इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।

प्रस्थितः + अयम् = प्रस्थितोऽयम्।

यहाँ विसर्ग-सन्धि और अवग्रह का प्रयोग हुआ है। इसका अर्थ है “यह प्रस्थित हुआ”।

Q18. “मूलसमस्याः” इति समस्तपदस्य विग्रहं कुरुत।

मूलाः समस्याः।

ऋषभदेव ने जनों की मूल समस्याएँ पहचानीं। इनमें आलस्य, कृषिकार्ये न्यूनता और उत्पादनक्षमता का अभाव प्रमुख थे।

Q19. “भोजननिर्माणम्” इति समस्तपदस्य विग्रहं कुरुत।

भोजनस्य निर्माणम्।

ऋषभदेव ने जनों को विविध पदार्थों से भोजननिर्माण सिखाया। यह जीवनकौशल विकास का भाग है।

Q20. “आर्थिकस्थितिः” इति पदस्य विग्रहं कुरुत।

आर्थिकी स्थितिः।

जनजीवन में उत्पादन और निर्माण बढ़ने से जनानाम् आर्थिकस्थितिः सुदृढा जाता। यह राज्य के सुभिक्ष होने का कारण बना।

Q21. “विधिलिखितम्” इति समस्तपदस्य विग्रहं कुरुत।

विधिना लिखितम्।

इसका अर्थ है नियति द्वारा लिखा हुआ। पाठ में कहा गया है — को वा जानाति विधिलिखितम्।

Q22. वाच्यपरिवर्तनं कुरुत: महाराजेन राज्यं समर्पितम्।

महाराजः राज्यं समर्पितवान्।

यह कर्मवाच्य से कर्तृवाच्य रूप है। “महाराजेन” के स्थान पर “महाराजः” और “समर्पितम्” के स्थान पर “समर्पितवान्” आता है।

Section D: पठित-अवबोधनम् – 30 Marks

पठित-अवबोधनम् में ऋषभदेव का जन्म, शासन, जनसमस्या, जीवन-परिवर्तन, उपवास, केवलज्ञान, नवकारमन्त्र और जैन सिद्धान्तों पर प्रश्न आ सकते हैं। Sanskrit Sharada Chapter 10 extract practice के लिए राजधर्म और त्याग का क्रम याद रखें।

Q23. ऋषभस्य माता-पितरौ कौ आस्ताम्?

ऋषभस्य पिता नाभिनामकः महाराजः और माता मरुदेवी आस्ताम्।

नाभि राजनीति, युद्धतन्त्र और प्रशासन में समर्थ थे। मरुदेवी बुद्धिमती और करुणाशालिनी थीं।

Q24. ऋषभः कीदृशः आसीत्?

ऋषभः सर्वगुणसम्पन्नः, अधीतविद्यः, राजनीतिज्ञः च आसीत्।

यौवन में उसे देखकर नाभि ने राज्यभार सौंपने का विचार किया। समाज की कठिन स्थिति उसकी परीक्षा बनी।

Q25. ऋषभदेवस्य कल्पना अनुसार देशे काः मूलसमस्याः आसन्?

ऋषभदेवस्य कल्पना अनुसार जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, उत्पादनक्षमतायाः अभावः च मूलसमस्याः आसन्।

इन कारणों से दुर्भिक्ष और विद्वेष बढ़ रहे थे। ऋषभदेव ने मूल कारणों को समझकर योजनाएँ बनाईं।

Q26. महाराजः केषु कार्येषु प्रजाः प्रशिक्षितवान्?

महाराजः प्रजाः कृषिकार्ये, भोजननिर्माणे, वस्त्रनिर्माणे, पशुपालने, पात्रनिर्माणे, गृहनिर्माणे और नगरनिर्माणे प्रशिक्षितवान्।

इन कौशलों से जन सक्रिय हुए। राज्य में सुभिक्ष और आर्थिक-सुदृढ़ता लौटी।

Q27. ऋषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना का आसीत्?

राजप्रासादे नृत्यकलाप्रदर्शनसमये एका नर्तकी सहसा भूमौ पतित्वा मृता।

इस घटना से ऋषभदेव का मन विक्षुब्ध हो गया। उन्होंने जीवन की अनित्यता और स्थिर सुख पर विचार किया।

Q28. ऋषभदेवः राज्यं केभ्यः समर्प्य भिक्षुरूपेण प्रस्थितः?

ऋषभदेवः विशालं साम्राज्यं स्वपुत्रेषु विभक्तवान्। विशेषतः विनिता राज्यं भरताय और तक्षशिलां बाहुबलये समर्पितवान्।

इसके बाद वे जीवन के परमसत्य की खोज में भिक्षुरूप से निकल पड़े। अनेक जन उनके अनुयायी बने।

Q29. ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः कथम् अभवत्?

ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः इक्षुरसेन अभवत्।

उनके प्रपौत्र श्रेयांस ने उन्हें पानार्थम् इक्षुरसं दिया। यह घटना वैशाखमासस्य अक्षयतृतीया-दिने हुई।

Q30. नवकारमन्त्रे केभ्यः नमस्कारः क्रियते?

नवकारमन्त्रे अरिहन्तेभ्यः, सिद्धेभ्यः, आचार्येभ्यः, उपाध्यायेभ्यः और लोके सर्वसाधुभ्यः नमस्कारः क्रियते।

यह जैनों का परमपावन मन्त्र है। इसे पञ्चपरमेष्ठियों को समर्पित प्रणाम माना जाता है।

NCERT Class 9 Sanskrit Sharada Chapter-Wise Questions

Chapter No. Chapter Name
Chapter 1 सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्
Chapter 2 सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः
Chapter 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
Chapter 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः
Chapter 5 एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी
Chapter 6 मनःपूतं समाचरेत्
Chapter 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
Chapter 8 अन्नाद् आनन्दं प्रति
Chapter 9 कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः
Chapter 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा २
Chapter 12 अन्वयः
Chapter 13 समासः
Chapter 14 वाच्यम्
Chapter 15 शब्दरूपाणि
Chapter 16 धातुरूपाणि

FAQs (Frequently Asked Questions)

णमो अरिहन्ताणम् means “I bow to the Arihantas.” It is the first line of the Navkar Mantra, which offers respect to spiritually victorious beings.

ऋषभदेव is the son of राजा नाभि and मरुदेवी. In Jain tradition, he is known as the first तीर्थङ्कर and आदिनाथ.

नवकारमन्त्रः is the sacred Jain mantra that bows to अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय and all साधु. The chapter gives it in Prakrit language.

The three jewels are सम्यग्दर्शनम्, सम्यग्ज्ञानम् and सम्यक्चरित्रम्. They represent right faith, right knowledge and right conduct.

The five महाव्रतानि are सत्यम्, अहिंसा, अस्तेयम्, अपरिग्रहः and ब्रह्मचर्यम्. The chapter presents them as welfare-giving vows for all beings.