Important Questions Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा 2
वर्णोच्चारण-शिक्षा 2 is a Class 9 Sanskrit Sharada chapter on आभ्यन्तर-प्रयत्न and the internal effort used in Sanskrit sound production.
For CBSE 2026-27 Class 9 Sanskrit exams, this chapter supports practice in अपठित-अवबोधनम्, रचनात्मक-कार्यम्, अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् and पठित-अवबोधनम्.
वर्णोच्चारण-शिक्षा 2 संस्कृत ध्वनियों के शुद्ध उच्चारण को समझाने वाला व्याकरण-आधारित पाठ है। पूर्व पाठ में वर्णोत्पत्ति के लिए आवश्यक तीन तत्त्व — स्थानम्, करणम् और आभ्यन्तर-प्रयत्नः — बताए गए थे। इस पाठ में विशेष रूप से आभ्यन्तर-प्रयत्न के पाँच भेद समझाए गए हैं: स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, ईषद्विवृत, विवृत और संवृत। Important Questions Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 11 विद्यार्थियों को स्वर-व्यञ्जन भेद, स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म, अयोगवाह, अकार का विशेष उच्चारण और पाणिनीय-शिक्षा-सूत्रों पर आधारित प्रश्नों के लिए तैयार करते हैं।
Key Takeaways
- Chapter focus: वर्णोच्चारण-शिक्षा 2 Class 9 संस्कृत वर्णों के उच्चारण में करण और स्थान के सम्बन्ध को समझाता है।
- Main concept: आभ्यन्तर-प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है — स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, ईषद्विवृत, विवृत और संवृत।
- Sound classification: स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म, अयोगवाह और स्वर अलग-अलग आभ्यन्तर-प्रयत्नों से उच्चरित होते हैं।
- Grammar value: Class 9 Sanskrit grammar practice में इस पाठ से वर्णभेद, प्रयत्नभेद, स्वर-व्यञ्जन भेद, प्रश्ननिर्माण और मिलान पूछा जा सकता है।
Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 11 Exam Pattern 2026-27
| Section | Question Area | Marks |
| A | अपठित-अवबोधनम् | 10 |
| B | रचनात्मक-कार्यम् | 15 |
| C | अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् | 25 |
| D | पठित-अवबोधनम् | 30 |
Section A: अपठित-अवबोधनम् – 10 Marks
अपठित-अवबोधनम् में वर्ण, उच्चारण, स्थान, करण और प्रयत्न से जुड़ा छोटा गद्यांश आ सकता है। वर्णोच्चारण-शिक्षा 2 word meanings ऐसे प्रश्नों में मदद करते हैं।
Q1. अधोलिखितम् अपठितगद्यांशं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत।
संस्कृतभाषायां वर्णानाम् उच्चारणं शुद्धं स्पष्टं च भवेत्। वर्णोत्पत्त्यर्थं स्थानम्, करणम्, प्रयत्नः च आवश्यकानि भवन्ति। आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं स्थानं प्रति यत् बलं प्रयुङ्क्ते, सः आभ्यन्तर-प्रयत्नः इति कथ्यते। एतेन स्वराणां व्यञ्जनानां च भेदः स्पष्टतया ज्ञायते। अभ्यासेन छात्राः सर्वेषां शब्दानां सुशुद्धम् उच्चारणं कर्तुं शक्नुवन्ति।
प्रश्नः: संस्कृतभाषायां वर्णानाम् उच्चारणं कीदृशं भवेत्?
उत्तरम्: संस्कृतभाषायां वर्णानाम् उच्चारणं शुद्धं स्पष्टं च भवेत्।
यह उत्तर गद्यांश की पहली पंक्ति से मिलता है। Chapter 11 का उद्देश्य भी यही है कि छात्र वर्णों और शब्दों का सुस्पष्ट तथा शुद्ध उच्चारण सीखें।
Q2. वर्णोत्पत्त्यर्थं कानि आवश्यकानि भवन्ति?
वर्णोत्पत्त्यर्थं स्थानम्, करणम्, प्रयत्नः च आवश्यकानि भवन्ति।
पाठ में इन तीन तत्त्वों को वर्णोत्पत्ति का आधार बताया गया है। स्थान वह है जहाँ ध्वनि बनती है, करण वह साधन है जो उस स्थान से सम्बन्ध बनाता है, और प्रयत्न उच्चारण में लगाया गया बल है।
Q3. आभ्यन्तर-प्रयत्नः कः इति गद्यांशानुसार लिखत।
आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं स्थानं प्रति यत् बलं प्रयुङ्क्ते, सः आभ्यन्तर-प्रयत्नः इति कथ्यते।
सरल शब्दों में, मुख के भीतर वर्ण उच्चारण के समय करण जिस प्रकार स्थान की ओर जाता है या उसे स्पर्श करता है, वही आभ्यन्तर-प्रयत्न है।
Q4. आभ्यन्तर-प्रयत्नेन केषां भेदः ज्ञायते?
आभ्यन्तर-प्रयत्नेन स्वराणां व्यञ्जनानां च भेदः ज्ञायते।
इससे यह भी समझ आता है कि स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म, अयोगवाह और स्वर एक-दूसरे से कैसे भिन्न हैं। इसलिए यह पाठ उच्चारण और वर्णवर्गीकरण दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
Q5. अभ्यासेन छात्राः किं कर्तुं शक्नुवन्ति?
अभ्यासेन छात्राः सर्वेषां शब्दानां सुशुद्धम् उच्चारणं कर्तुं शक्नुवन्ति।
यह उत्तर पाठ के निष्कर्ष से जुड़ा है। स्थान, करण और आभ्यन्तर-प्रयत्न का ज्ञान अभ्यास के साथ शुद्ध उच्चारण में बदलता है।
Section B: रचनात्मक-कार्यम् – 15 Marks
रचनात्मक-कार्यम् में लघु अनुच्छेद, सरल परिभाषा, तालिका-आधारित उत्तर और वाक्य-रचना पूछी जा सकती है। Important Questions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 11 में वर्ण, स्वर, व्यञ्जन और प्रयत्न अच्छे लेखन-विषय हैं।
Q6. मञ्जूषायाः साहाय्येन पत्रस्य रिक्तस्थानानि पूरयत।
मञ्जूषा: उच्चारणम्, करणम्, विद्यालये, आभ्यन्तर-प्रयत्नः, नमः
प्रिय मित्र,
सप्रेम ______। अद्य अस्माकं ______ संस्कृतशिक्षकः वर्णोच्चारणविषये पाठं पाठितवान्। सः अवदत् यत् वर्णोत्पत्त्यर्थं स्थानम्, ______ और प्रयत्नः आवश्यकानि भवन्ति। आस्यस्य अभ्यन्तरे प्रयुक्तः बलः ______ इति कथ्यते। अस्य ज्ञानेन ______ शुद्धं भवति।
तव मित्रम्
आर्यः
उत्तरम्: नमः, विद्यालये, करणम्, आभ्यन्तर-प्रयत्नः, उच्चारणम्।
यह पत्र Chapter 11 के मुख्य व्याकरण-विषय पर आधारित है। इसमें वर्णोत्पत्ति, करण और आभ्यन्तर-प्रयत्न जैसे शब्द स्वाभाविक रूप से आते हैं।
Q7. “आभ्यन्तर-प्रयत्नः” इति विषयम् आधृत्य पञ्च संस्कृतवाक्यानि लिखत।
आभ्यन्तर-प्रयत्नः वर्णोच्चारणे महत्त्वपूर्णः अस्ति।
आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य स्थानं प्रति प्रयत्नः आभ्यन्तर-प्रयत्नः कथ्यते।
आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्चविधः भवति।
स्पृष्ट-प्रयत्नेन स्पर्शव्यञ्जनानि उत्पद्यन्ते।
विवृत-प्रयत्नेन अधिकांशस्वराः उच्चार्यन्ते।
ये वाक्य Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 11 important questions में लघु लेखन और परिभाषा-अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।
Q8. “स्वरः” शब्देन द्वे संस्कृतवाक्ये लिखत।
स्वरः स्वतन्त्रः वर्णः अस्ति।
स्वरस्य उच्चारणार्थम् अन्यः वर्णः आवश्यकः न भवति।
स्वर और व्यञ्जन का मुख्य अन्तर यही है कि स्वर स्वतन्त्र रूप से उच्चरित होता है। व्यञ्जन को उच्चारण के लिए आधार-स्वर की आवश्यकता होती है।
Q9. हिन्दी वाक्यस्य संस्कृते अनुवादं कुरुत: स्वर स्वतंत्र वर्ण हैं।
स्वराः स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति।
यह वाक्य पाठ में दिए गए स्वर-व्यञ्जन भेद से जुड़ा है। स्वर अपने आप उच्चरित हो सकते हैं, इसलिए उन्हें स्वतन्त्र कहा गया है।
Q10. हिन्दी वाक्यस्य संस्कृते अनुवादं कुरुत: व्यंजन परतंत्र वर्ण हैं।
व्यञ्जनानि परतन्त्रवर्णाः सन्ति।
व्यञ्जन को उच्चारण के लिए आधार-स्वर चाहिए। इसी कारण वे स्वर से भिन्न माने जाते हैं।
Q11. “स्पर्शव्यञ्जनानि” शब्देन एकं संस्कृतवाक्यं रचयत।
स्पर्शव्यञ्जनानि स्पृष्ट-प्रयत्नेन उत्पद्यन्ते।
यह वाक्य Chapter 11 की मुख्य वर्गीकरण-रेखा को बताता है। क, ख, ग, घ, ङ से लेकर प, फ, ब, भ, म तक वर्गीय वर्ण स्पर्शव्यञ्जन हैं।
Q12. “अयोगवाहौ” शब्देन एकं संस्कृतवाक्यं लिखत।
अनुस्वारः विसर्गः च अयोगवाहौ स्तः।
अयोगवाहौ विशिष्ट व्यञ्जन माने गए हैं। इनके उच्चारण में ईषद्विवृत-प्रयत्न से सम्बन्ध बताया गया है।
Section C: अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् – 25 Marks
अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् में Class 9 Sanskrit varna uccharan questions, प्रयत्न-भेद, वर्ण-भेद, मिलान और प्रश्ननिर्माण पूछे जा सकते हैं। इस पाठ में परिभाषाएँ और वर्गीकरण बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।
Q13. आभ्यन्तर-प्रयत्नः कतिविधः?
आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्चविधः भवति।
इसके पाँच भेद हैं — स्पृष्ट-प्रयत्नः, ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः, ईषद्विवृत-प्रयत्नः, विवृत-प्रयत्नः और संवृत-प्रयत्नः। इन पाँचों से वर्णों के उच्चारण में स्थान-करण सम्बन्ध समझ आता है।
Q14. स्पृष्ट-प्रयत्नः कदा भवति?
यदा करणं स्थानं स्पष्ट-रूपेण स्पृशति, तदा स्पृष्ट-प्रयत्नः भवति।
इस प्रयत्न में स्थान और करण के बीच स्पष्ट स्पर्श होता है। इसी कारण इससे स्पर्श-व्यञ्जन उत्पन्न होते हैं, जैसे क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग और प-वर्ग।
Q15. ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः कदा भवति?
यदा करणं स्थानं स्वल्पम् एव स्पृशति, तदा ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः भवति।
इसमें स्पर्श होता है, पर वह पूर्ण या स्पष्ट नहीं होता। पाठ के अनुसार इस प्रयत्न से अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि उत्पन्न होते हैं, जैसे य, र, ल, व।
Q16. ईषद्विवृत-प्रयत्नः कदा भवति?
यदा करणं स्थानं न स्पृशति, परन्तु स्थानस्य बहु समीपं याति, तदा ईषद्विवृत-प्रयत्नः भवति।
ऐसी स्थिति में स्थान और करण के बीच लघु विवर या छोटा अन्तराल बनता है। इससे ऊष्म-व्यञ्जन और अयोगवाहों का उच्चारण समझाया जाता है।
Q17. विवृत-प्रयत्नः कदा भवति?
यदा करणं स्थानं न स्पृशति, अपि तु स्थानस्य किञ्चित् समीपं याति और स्पष्ट अन्तराल बनता है, तदा विवृत-प्रयत्नः भवति।
इस प्रयत्न से अ-कार को छोड़कर अन्य स्वर उच्चरित होते हैं। इसलिए स्वर-वर्ग को समझने में विवृत-प्रयत्न बहुत महत्त्वपूर्ण है।
Q18. संवृत-प्रयत्नः कुत्र भवति?
संवृत-प्रयत्नः विशेषरूपेण ह्रस्व अ-कारस्य उच्चारणे भवति।
ह्रस्व अ-कार के उच्चारण में कण्ठ में संकोच होता है। इसलिए अ-कार को अन्य स्वरों से अलग विशिष्ट स्वर माना गया है।
Q19. “अ” वर्णस्य कति उपभेदाः सन्ति?
“अ” वर्णस्य त्रयः उपभेदाः सन्ति — अ-कारः, आ-कारः, अ३-कारः।
इनमें ह्रस्व अ-कार के उच्चारण में संवृत-प्रयत्न होता है। आ-कार और अ३-कार के उच्चारण में अन्य स्वरों की तरह विवृत-प्रयत्न होता है।
Q20. “य, र, ल, व” केषु वर्णेषु परिगण्यन्ते?
“य, र, ल, व” अन्तःस्थ-व्यञ्जनेषु परिगण्यन्ते।
इन्हें अर्धस्वर भी कहा जाता है। इनके उच्चारण में ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्न होता है, क्योंकि करण स्थान को हल्के रूप में स्पर्श करता है।
Q21. “श, ष, स, ह” केषु वर्णेषु परिगण्यन्ते?
“श, ष, स, ह” ऊष्म-व्यञ्जनेषु परिगण्यन्ते।
इनके उच्चारण में स्थान-करण के बीच छोटा अन्तराल रहता है। इसलिए इन्हें ईषद्विवृत-प्रयत्न से सम्बद्ध किया जाता है।
Q22. “अं, अः” केषु वर्णेषु परिगण्येते?
“अं, अः” अयोगवाहौ इति परिगण्येते।
अं अनुस्वार है और अः विसर्ग है। ये विशिष्ट व्यञ्जन हैं और इनके आधार-स्वर का स्थान पूर्व में होता है।
Section D: पठित-अवबोधनम् – 30 Marks
पठित-अवबोधनम् में आभ्यन्तर-प्रयत्न की परिभाषा, पाँच प्रयत्न, स्वर-व्यञ्जन भेद, समानाक्षर-सन्ध्यक्षर और पाणिनीय-शिक्षा-सूत्रों पर प्रश्न आ सकते हैं। Class 9 Sanskrit Chapter 11 questions answers के लिए तालिकाएँ और वर्गीकरण ध्यान से पढ़ें।
Q23. वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं कति तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति?
वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति — स्थानम्, करणम् और आभ्यन्तर-प्रयत्नः।
इन तीनों के बिना वर्णोच्चारण की प्रक्रिया पूरी तरह नहीं समझी जा सकती। स्थान उच्चारण का बिन्दु है, करण उच्चारण-साधन है और आभ्यन्तर-प्रयत्न मुख के भीतर लगाया गया बल है।
Q24. आभ्यन्तर-प्रयत्नः कः उच्यते?
आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति या स्थानस्य समीपं याति, सः प्रयत्नः आभ्यन्तर-प्रयत्नः उच्यते।
यह परिभाषा पाठ का मुख्य आधार है। इसी से यह पता चलता है कि कौन-सा वर्ण पूर्ण स्पर्श से, कौन हल्के स्पर्श से और कौन अन्तराल से उच्चरित होता है।
Q25. आभ्यन्तर-प्रयत्नाः कुत्र दृश्यन्ते?
आभ्यन्तर-प्रयत्नाः कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य और ओष्ठ्य वर्णों में दृश्यन्ते।
इन पाँच प्रकार के वर्ण-स्थान में करण का स्थान से अलग-अलग सम्बन्ध बनता है। नासिक्य वर्णों का भी वर्ण-वर्गीकरण में महत्त्व है, पर पाठ में आभ्यन्तर-प्रयत्न के उदाहरण मुख्य रूप से इन पाँच स्थानों से समझाए गए हैं।
Q26. स्वराणां व्यञ्जनानां च मुख्यः भेदः कः?
स्वराः स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति, परन्तु व्यञ्जनानि परतन्त्रवर्णाः भवन्ति।
स्वर के उच्चारण के लिए कोई दूसरा वर्ण आवश्यक नहीं होता। व्यञ्जन के उच्चारण के लिए आधार-स्वर चाहिए, इसलिए व्यञ्जन स्वयं पूर्ण उच्चारण नहीं दे पाते।
Q27. स्वराणां द्वौ भेदौ कौ स्तः?
स्वराणां द्वौ भेदौ स्तः — समानाक्षरस्वराः और सन्ध्यक्षरस्वराः।
समानाक्षरस्वर एक-स्थानी होते हैं। सन्ध्यक्षरस्वर द्वि-स्थानी होते हैं और इनके ह्रस्व रूप नहीं होते; इनमें दीर्घ और प्लुत भेद मिलते हैं।
Q28. व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः के सन्ति?
व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः सन्ति — स्पर्शव्यञ्जनानि, अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि, ऊष्म-व्यञ्जनानि और अयोगवाहौ।
स्पर्शव्यञ्जनों में स्पष्ट स्पर्श होता है। अन्तःस्थ में हल्का स्पर्श, ऊष्म में हल्का खुलापन और अयोगवाहों में विशिष्ट उच्चारण-रूप मिलता है।
Q29. “स्ष्टपृ-करणाः स्पर्शाः” इति पाणिनीय-शिक्षा-सूत्रस्य अर्थं लिखत।
“स्ष्टपृ-करणाः स्पर्शाः” इति सूत्रस्य अर्थः — स्पर्शवर्णों के उच्चारण में करण स्पष्ट रूप से स्थान को स्पर्श करता है।
इससे स्पर्शव्यञ्जनों का नाम और प्रकृति दोनों समझ आते हैं। क, ख, ग, घ, ङ आदि वर्गीय व्यञ्जन इसी प्रकार के प्रयत्न से उच्चरित होते हैं।
Q30. “संवृतस्त्वकारः” इति सूत्रस्य अर्थं लिखत।
“संवृतस्त्वकारः” इति सूत्रस्य अर्थः — अ-कार के उच्चारण में संवृत-प्रयत्न होता है।
यह अकार का विशेष नियम है। अन्य स्वर सामान्यतः विवृत-प्रयत्न से उच्चरित होते हैं, पर ह्रस्व अकार में कण्ठ में संकोच होता है, इसलिए उसे संवृत कहा गया है।
NCERT Class 9 Sanskrit Sharada Chapter-Wise Questions
| Chapter No. | Chapter Name |
| Chapter 1 | सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् |
| Chapter 2 | सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः |
| Chapter 3 | आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः |
| Chapter 4 | न खलु वयस्तेजसो हेतुः |
| Chapter 5 | एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी |
| Chapter 6 | मनःपूतं समाचरेत् |
| Chapter 7 | उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् |
| Chapter 8 | अन्नाद् आनन्दं प्रति |
| Chapter 9 | कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः |
| Chapter 10 | णमो अरिहंताणम् |
| Chapter 12 | अन्वयः |
| Chapter 13 | समासः |
| Chapter 14 | वाच्यम् |
| Chapter 15 | शब्दरूपाणि |
| Chapter 16 | धातुरूपाणि |
FAQs (Frequently Asked Questions)
आभ्यन्तर-प्रयत्नः is the internal effort used inside the mouth during pronunciation. It explains how the करण moves towards or touches the स्थान while producing a Sanskrit sound.
The five आभ्यन्तर-प्रयत्नाः are स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, ईषद्विवृत, विवृत and संवृत. These five efforts help classify Sanskrit sounds according to how they are pronounced.
अ-कारः is special because its ह्रस्व form is produced with संवृत-प्रयत्नः. In this pronunciation, the throat becomes slightly contracted, unlike most other vowels that use विवृत-प्रयत्नः.
स्वर is an independent sound and can be pronounced without another letter. व्यञ्जन is dependent and needs a base vowel for full pronunciation.
अयोगवाहौ are अनुस्वारः and विसर्गः. They are special consonantal sounds and are treated separately from स्पर्श, अन्तःस्थ and ऊष्म व्यञ्जन.