Important Questions Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्

उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् is a Class 9 Sanskrit Sharada story from Panchatantra about wisdom, honesty and the danger of deceit. For CBSE 2026-27 Class 9 Sanskrit exams, this chapter supports practice in अपठित-अवबोधनम्, रचनात्मक-कार्यम्, अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् and पठित-अवबोधनम्.

मार्ग में मिला धन देखकर बालक प्रसन्न होता है, पर माता उसे समझाती है कि दूसरे का श्रमार्जित धन तृणवत् समझना चाहिए। इसी शिक्षा के लिए वह पञ्चतन्त्र की धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा सुनाती है। पापबुद्धि धन कमाने के बाद मित्र को छलना चाहता है, पर उसका ही उपाय अपाय बन जाता है। Important Questions Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7 विद्यार्थियों को कथा-क्रम, संवाद, नीति-वाक्य, क्तवतु-प्रत्यय, तत्पुरुष-समास, विशेषण-विशेष्य और शब्दार्थ के लिए तैयार करते हैं।

Key Takeaways

  • Chapter focus: उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् Class 9 बुद्धिमान व्यक्ति को उपाय के साथ अपाय भी सोचने की शिक्षा देता है।
  • Story source: यह कथा पञ्चतन्त्र के मित्रभेद नामक प्रथम तन्त्र से ली गई है।
  • Main characters: धर्मबुद्धि, पापबुद्धि, पापबुद्धि का पिता और धर्माधिकारी कथा के मुख्य पात्र हैं।
  • Grammar value: Class 9 Sanskrit grammar practice में इस पाठ से क्तवतु-प्रत्यय, तत्पुरुष-समास, नित्यबहुवचनान्त शब्द और विशेषण-विशेष्य पूछे जा सकते हैं।

Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7 Exam Pattern 2026-27

Section Question Area Marks
A अपठित-अवबोधनम् 10
B रचनात्मक-कार्यम् 15
C अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् 25
D पठित-अवबोधनम् 30

Section A: अपठित-अवबोधनम् – 10 Marks

अपठित-अवबोधनम् में ईमानदारी, परद्रव्य, नीति, मित्रता और लोभ से जुड़ा गद्यांश आ सकता है। उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् word meanings ऐसे प्रश्नों में उपयोगी हैं।

Q1. अधोलिखितम् अपठितगद्यांशं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत।

एकः बालकः मार्गे पतितं धनं दृष्टवान्। सः तत् धनं स्वीकर्तुम् इच्छति स्म। तस्य माता अवदत् — “पुत्र, एतत् अन्यस्य धनम् अस्ति। अन्यस्य धनं तृणवत् गणनीयम्। यः परद्रव्यं न गृह्णाति, सः एव धर्मबुद्धिः भवति।” बालकः मातुः वचनं श्रुत्वा धनं स्वामिने प्रत्यर्पितवान्।

प्रश्नः: बालकः मार्गे किं दृष्टवान्?
उत्तरम्: बालकः मार्गे पतितं धनं दृष्टवान्।

यह उत्तर गद्यांश की पहली पंक्ति से मिलता है। पाठ का आरम्भ भी मार्ग में मिले धन से होता है।

Q2. माता बालकं किम् अवदत्?

माता बालकं अवदत् यत् एतत् अन्यस्य धनम् अस्ति।

माता उसे सिखाती है कि दूसरे का श्रमार्जित धन वापस करना चाहिए। यह पाठ का नैतिक आधार है।

Q3. अन्यस्य धनं कथं गणनीयम्?

अन्यस्य धनं तृणवत् गणनीयम्।

इसका अर्थ है कि दूसरे के धन में लोभ नहीं करना चाहिए। सज्जन व्यक्ति परद्रव्य को मिट्टी या तृण के समान देखते हैं।

Q4. यः परद्रव्यं न गृह्णाति, सः कीदृशः भवति?

यः परद्रव्यं न गृह्णाति, सः धर्मबुद्धिः भवति।

धर्मबुद्धि नामक पात्र इसी नीति का उदाहरण है। वह चोरी नहीं करता और सत्य पर स्थिर रहता है।

Q5. गद्यांशात् एकं क्रियापदं लिखत।

क्रियापदम् — प्रत्यर्पितवान्।

“प्रत्यर्पितवान्” भूतकाल का रूप है। इसका अर्थ है वापस कर दिया।

Section B: रचनात्मक-कार्यम् – 15 Marks

रचनात्मक-कार्यम् में पत्र, संवाद, वाक्य-रचना और अनुवाद के प्रश्न आ सकते हैं। Important Questions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7 में ईमानदारी, परद्रव्य और पञ्चतन्त्र की नीति अच्छे लेखन-विषय हैं।

Q6. मञ्जूषायाः साहाय्येन पत्रस्य रिक्तस्थानानि पूरयत।

मञ्जूषा: धनम्, धर्मबुद्धिः, विद्यालये, पञ्चतन्त्रम्, नमः

प्रिय मित्र,
सप्रेम ______। अद्य अस्माकं ______ आचार्यः ______ कथां पाठितवान्। कथायां पापबुद्धिः मित्रस्य ______ चोरितवान्। परन्तु ______ सत्येन विजयी अभवत्।
तव मित्रम्
सौरभः

उत्तरम्: नमः, विद्यालये, पञ्चतन्त्रम्, धनम्, धर्मबुद्धिः।

यह पत्र Chapter 7 की कथा पर आधारित है। इसमें पञ्चतन्त्र, धन और धर्मबुद्धि जैसे मुख्य शब्द आते हैं।

Q7. “परद्रव्यम्” इति विषयम् आधृत्य पञ्च संस्कृतवाक्यानि लिखत।

परद्रव्यं न ग्राह्यम्।
अन्यस्य धनं तृणवत् गणनीयम्।
सज्जनाः परद्रव्येषु लोष्ठवत् पश्यन्ति।
धर्मबुद्धिः चौरकर्म न करोति।
लोभः मनुष्यं विनाशं नयति।

ये वाक्य Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7 important questions में लेखन अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।

Q8. “धर्मबुद्धिः” शब्देन द्वे संस्कृतवाक्ये लिखत।

धर्मबुद्धिः सत्यवादी आसीत्।
धर्मबुद्धिः परद्रव्यं न अहरत्।

धर्मबुद्धि कथा का सज्जन पात्र है। उसके नाम में ही धर्म और सद्बुद्धि का भाव है।

Q9. हिन्दी वाक्यस्य संस्कृते अनुवादं कुरुत: दूसरे का धन नहीं लेना चाहिए।

अन्यस्य धनं न ग्राह्यम्।

यह वाक्य अध्याय के आरम्भिक मातृ-उपदेश से जुड़ा है। परद्रव्य को तृणवत् मानना चाहिए।

Q10. हिन्दी वाक्यस्य संस्कृते अनुवादं कुरुत: बुद्धिमान उपाय और अपाय दोनों सोचता है।

प्राज्ञः उपायम् अपायं च चिन्तयति।

यह वाक्य अध्याय के शीर्षक का सरल रूप है। कथा में पापबुद्धि उपाय सोचता है, पर अपाय नहीं सोचता।

Q11. “पञ्चतन्त्रम्” शब्देन एकं संस्कृतवाक्यं रचयत।

पञ्चतन्त्रं नीतिकथानां प्रसिद्धः ग्रन्थः अस्ति।

इस पाठ की कथा पञ्चतन्त्र के मित्रभेद तन्त्र से ली गई है। इसमें कथा के माध्यम से नीति सिखाई गई है।

Q12. “लोभः” शब्देन एकं संस्कृतवाक्यं लिखत।

लोभः पापबुद्धेः विनाशस्य कारणम् अभवत्।

पापबुद्धि लोभ के कारण मित्र को धोखा देता है। अन्त में उसका छल प्रकट हो जाता है।

Section C: अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् – 25 Marks

अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् में Class 9 Sanskrit kta vatu pratyaya practice, तत्पुरुष-समास, विशेषण-विशेष्य, नित्यबहुवचनान्त शब्द और प्रश्ननिर्माण पूछे जा सकते हैं। इस पाठ में “प्राप्तवान्”, “गतवन्तौ”, “दृष्टवन्तौ”, “दण्डितवन्तः” जैसे रूप आते हैं।

Q13. “प्राप्तवान्” इति क्तवतु-प्रत्ययान्तशब्दस्य लिङ्गं वचनं च लिखत।

“प्राप्तवान्” पुल्लिङ्गे प्रथमा-एकवचनम् अस्ति।

यह रूप बालक या पुरुष कर्ता के लिए आता है। पाठ के आरम्भ में “अहं मार्गे पतितं धनं प्राप्तवान्” भाव आता है।

Q14. “दृष्टवन्तौ” इति रूपस्य लिङ्गं वचनं च लिखत।

“दृष्टवन्तौ” पुल्लिङ्गे प्रथमा-द्विवचनम् अस्ति।

यह रूप दो पुरुष कर्ताओं के लिए आता है। पाठ में द्वौ मित्रौ रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ।

Q15. “दण्डितवन्तः” इति रूपस्य लिङ्गं वचनं च लिखत।

“दण्डितवन्तः” पुल्लिङ्गे प्रथमा-बहुवचनम् अस्ति।

यह रूप राजपुरुषाः के लिए प्रयुक्त हो सकता है। पाठ में राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः।

Q16. “गुरुजनाज्ञया” इति समस्तपदस्य विग्रहं कुरुत।

गुरुजनानाम् आज्ञया।

धर्मबुद्धि देशान्तर जाने से पहले गुरुजनों की अनुमति लेने की बात करता है। यह उसकी संस्कारित बुद्धि को दिखाता है।

Q17. “वनदेवता” इति पदस्य विग्रहं कुरुत।

वनस्य देवता।

धर्माधिकारी कहता है कि जहाँ मानुषप्रमाण उपलब्ध नहीं है, वहाँ वनदेवता न्यायनिर्णय करेगी।

Q18. “वित्ताभावात्” इति पदस्य विग्रहं कुरुत।

वित्तस्य अभावात्।

इसका अर्थ है धन के अभाव से। पापबुद्धि झूठ बोलता है कि उसके परिवार में धनाभाव से कष्ट है।

Q19. “धरणीपीठे” इति पदस्य विग्रहं कुरुत।

धरण्याः पीठे।

यह पद श्लोक में आता है। इसका अर्थ है धरती पर।

Q20. नित्यबहुवचनान्तशब्दं चिनुत: आपः, द्यौः, अहनि।

नित्यबहुवचनान्तशब्दः — आपः।

“आपः” जल के अर्थ में बहुवचन रूप में प्रयोग होता है। पाठ के श्लोक में भी आपः बहुवचन में आता है।

Q21. वाक्ये विशेषणं विशेष्यं च चिनुत: प्रहृष्टमनाः पापबुद्धिः आह।

विशेषणम् — प्रहृष्टमनाः।
विशेष्यम् — पापबुद्धिः।

विशेषण और विशेष्य में लिङ्ग, वचन और विभक्ति का सम्बन्ध होता है। यहाँ दोनों प्रथमा एकवचन में हैं।

Q22. स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत: निशीथे अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तम् आनीतवान्।

कदा अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तम् आनीतवान्?

यह प्रश्न “निशीथे” पद पर आधारित है। उत्तर होगा — निशीथे।

Section D: पठित-अवबोधनम् – 30 Marks

पठित-अवबोधनम् में कथा-क्रम, पात्र, संवाद, नीति-श्लोक और पञ्चतन्त्र-प्रसंग पर प्रश्न पूछे जा सकते हैं। Sanskrit Sharada Chapter 7 extract practice के लिए धर्मबुद्धि-पापबुद्धि विवाद और शमीकोटर घटना महत्वपूर्ण है।

Q23. माता पुत्रं किम् उपदिशति?

माता पुत्रं उपदिशति यत् अन्यस्य श्रमार्जितं धनं तस्मै एव प्रत्यर्पणीयम्।

वह कहती है कि अन्यस्य धनं तृणवत् गणनीयम्। इसी शिक्षा के लिए वह पञ्चतन्त्र की कथा सुनाती है।

Q24. पापबुद्धिः किमर्थं धर्मबुद्धिं देशान्तरं नेतुम् इच्छति?

पापबुद्धिः धर्मबुद्धिं देशान्तरं नेतुम् इच्छति, क्योंकि वह उसके आश्रय से धन कमाकर उसे छलना चाहता था।

पापबुद्धि स्वयं को मूर्ख और दरिद्र मानता था। इसलिए उसने धर्मबुद्धि को साधन बनाकर धन कमाने की योजना बनाई।

Q25. पापबुद्धिः धर्मबुद्धिं देशान्तरगमनाय कथं प्रेरयति?

पापबुद्धिः कहता है कि जिसने देशान्तरों की भाषा, वेश और विविध जीवन नहीं देखा, उसका जन्म व्यर्थ है।

वह श्लोकों के माध्यम से धर्मबुद्धि को यात्रा और धनार्जन के लिए प्रेरित करता है। धर्मबुद्धि गुरुजनाज्ञया चलने को तैयार हो जाता है।

Q26. द्वौ मित्रौ धनं कुत्र निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ?

द्वौ मित्रौ धनं गहनारण्ये भूमौ निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ।

पापबुद्धि ने सुझाव दिया कि पूरा धन घर ले जाना उचित नहीं है। धर्मबुद्धि ने विश्वास करके बात मान ली।

Q27. पापबुद्धिः निशीथे किं कृतवान्?

पापबुद्धिः निशीथे अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं गतवान्।

उसने अकेले जाकर सारा धन चुरा लिया। बाद में उसी ने धर्मबुद्धि पर चोरी का आरोप लगाया।

Q28. धर्माधिकारी किम् अवदत्?

धर्माधिकारी अवदत् यत् यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं, तत्र वनदेवता एव न्यायनिर्णयं करिष्यति।

इसलिए उसने प्रातःकाल दोनों को वनप्रदेश में आने को कहा। पापबुद्धि ने इसी अवसर पर नया छल रचा।

Q29. पापबुद्धिः स्वपितरं किम् उक्तवान्?

पापबुद्धिः स्वपितरं उक्तवान् यत् सः शमीवृक्षस्य कोटरे प्रविश्य धर्मबुद्धिं चौरः इति वदतु।

वह पिता को झूठा साक्षी बनाना चाहता था। इसी छल के कारण पिता की मृत्यु हुई और पापबुद्धि दण्डित हुआ।

Q30. “उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्” इति वाक्यस्य भावं लिखत।

इस वाक्य का भाव है कि बुद्धिमान व्यक्ति उपाय के साथ उसके सम्भावित संकट को भी सोचता है।

पापबुद्धि ने धन पाने का उपाय सोचा, पर उसके अपाय को नहीं समझा। उसका छल उसी के विनाश का कारण बना।

NCERT Class 9 Sanskrit Sharada Chapter-Wise Questions

Chapter No. Chapter Name
Chapter 1 सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्
Chapter 2 सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः
Chapter 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
Chapter 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः
Chapter 5 एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी
Chapter 6 मनःपूतं समाचरेत्
Chapter 8 अन्नाद् आनन्दं प्रति
Chapter 9 कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः
Chapter 10 णमो अरिहंताणम्
Chapter 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा २
Chapter 12 अन्वयः
Chapter 13 समासः
Chapter 14 वाच्यम्
Chapter 15 शब्दरूपाणि
Chapter 16 धातुरूपाणि

FAQs (Frequently Asked Questions)

उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् means a wise person should think of the solution and also its possible danger. The chapter shows this through पापबुद्धि’s failed deceit.

धर्मबुद्धि and पापबुद्धि are two friends in the Panchatantra story. धर्मबुद्धि represents honesty, while पापबुद्धि represents greed and deceit.

परद्रव्येषु लोष्ठवत् means one should look at others’ wealth like a lump of clay. It teaches freedom from greed and respect for another person’s property.

शमीकोटरम् means the hollow of a Shami tree. पापबुद्धि hides his father inside it so that he can falsely accuse धर्मबुद्धि of stealing the money.

पञ्चतन्त्रम् is a famous collection of moral stories written by विष्णु शर्मा. The story in Chapter 7 comes from मित्रभेदः, the first tantra of Panchatantra.