Important Questions Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 मनःपूतं समाचरेत्

मनःपूतं समाचरेत् is a Class 9 Sanskrit Sharada chapter built around subhashitas that teach pure intention, discipline, effort and thoughtful action.
For CBSE 2026-27 Class 9 Sanskrit exams, this chapter supports practice in अपठित-अवबोधनम्, रचनात्मक-कार्यम्, अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् and पठित-अवबोधनम्.

कोई भी कार्य आरम्भ करने से पहले तरीका, विचार और मन की शुद्धता आवश्यक है। इस पाठ में आचार्य छात्रों को बताते हैं कि यदि मन मलिन हो या उद्देश्य अनुचित हो, तो कार्य का फल भी दूषित हो सकता है। मनःपूतं समाचरेत् में मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता, नीतिशतक, पञ्चतन्त्र, मालविकाग्निमित्रम् और किरातार्जुनीयम् जैसे ग्रन्थों से सुभाषित लिए गए हैं। Important Questions Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 विद्यार्थियों को श्लोक, अन्वय, भावार्थ, सन्धि, समास और जीवनमूल्य-आधारित उत्तरों के लिए तैयार करते हैं।

Key Takeaways

  • Chapter focus: मनःपूतं समाचरेत् Class 9 शुद्ध मन, सत्य वाणी, अभ्यास, परिश्रम और विवेकपूर्ण आचरण सिखाता है।
  • Subhashita base: पाठ में मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता, नीतिशतक, पञ्चतन्त्र, मालविकाग्निमित्रम् और किरातार्जुनीयम् के श्लोक हैं।
  • Value learning: धर्मलक्षण, श्रेष्ठजन का आचरण, अभ्यास, विघ्नों में धैर्य और सहसा कार्य न करने का संदेश आता है।
  • Grammar value: Class 9 Sanskrit grammar practice में इस पाठ से अन्वय, सन्धिविच्छेद, समास, रिक्तस्थान और प्रश्ननिर्माण पूछा जा सकता है।

Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 Exam Pattern 2026-27

Section Question Area Marks
A अपठित-अवबोधनम् 10
B रचनात्मक-कार्यम् 15
C अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् 25
D पठित-अवबोधनम् 30

Section A: अपठित-अवबोधनम् – 10 Marks

अपठित-अवबोधनम् में सुभाषित, सदाचार, अभ्यास, सत्य, धैर्य और विवेक से जुड़ा गद्यांश आ सकता है। मनःपूतं समाचरेत् word meanings ऐसे प्रश्नों में सहायक हैं।

Q1. अधोलिखितम् अपठितगद्यांशं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत।

मनुष्येण सर्वाणि कार्याणि शुद्धेन मनसा करणीयानि। सत्यवाणी, धैर्यम्, अभ्यासः, क्षमा, शौचम् च जीवनस्य श्रेष्ठगुणाः सन्ति। यः विचार्य कार्यं करोति, सः सफलतां प्राप्नोति। सहसा कृतं कार्यं कदाचित् विपत्तेः कारणं भवति। अतः विवेकः सर्वदा आवश्यकः।

प्रश्नः: मनुष्येण कार्याणि कथं करणीयानि?
उत्तरम्: मनुष्येण सर्वाणि कार्याणि शुद्धेन मनसा करणीयानि।

यह उत्तर गद्यांश की पहली पंक्ति से मिलता है। यही भाव पाठ के शीर्षक “मनःपूतं समाचरेत्” में आता है।

Q2. गद्यांशानुसार जीवनस्य श्रेष्ठगुणाः के सन्ति?

जीवनस्य श्रेष्ठगुणाः सत्यवाणी, धैर्यम्, अभ्यासः, क्षमा, शौचम् च सन्ति।

ये गुण पाठ में दिए गए सुभाषितों से जुड़े हैं। धर्मलक्षण वाले श्लोक में भी धृति, क्षमा, दम, शौच और सत्य आते हैं।

Q3. यः विचार्य कार्यं करोति, सः किं प्राप्नोति?

यः विचार्य कार्यं करोति, सः सफलतां प्राप्नोति।

यह उत्तर किरातार्जुनीयम् के श्लोक “सहसा विदधीत न क्रियाम्” के भाव से जुड़ा है। विचारपूर्वक कार्य करना श्रेष्ठ माना गया है।

Q4. सहसा कृतं कार्यं कस्य कारणं भवति?

सहसा कृतं कार्यं कदाचित् विपत्तेः कारणं भवति।

पाठ में अविवेक को परम आपदाओं का स्थान कहा गया है। इसलिए बिना सोचे कार्य नहीं करना चाहिए।

Q5. गद्यांशात् एकं गुणबोधकं पदं लिखत।

गुणबोधकं पदम् — धैर्यम्।

धैर्य या धृति धर्मलक्षणों में से एक है। यह कठिन परिस्थिति में स्थिर रहने की शक्ति देता है।

Section B: रचनात्मक-कार्यम् – 15 Marks

रचनात्मक-कार्यम् में पत्र, वाक्य-रचना, चित्रवर्णन और अनुवाद के प्रश्न आ सकते हैं। Important Questions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 में सत्यवाणी, अभ्यास, धर्मलक्षण और विवेक अच्छे लेखन-विषय हैं।

Q6. मञ्जूषायाः साहाय्येन पत्रस्य रिक्तस्थानानि पूरयत।

मञ्जूषा: अभ्यासः, सत्यवाणी, विद्यालये, सुभाषितानि, नमः

प्रिय मित्र,
सप्रेम ______। अद्य अस्माकं ______ आचार्यः ______ पाठितवान्। सः अवदत् यत् ______ सर्वासां कलानां मूलम् अस्ति। मनुष्येण सदा ______ वदनीया।
तव मित्रम्
अभिनवः

उत्तरम्: नमः, विद्यालये, सुभाषितानि, अभ्यासः, सत्यवाणी।

यह पत्र पाठ के मुख्य विचारों से जुड़ा है। इसमें अभ्यास और सत्यवाणी जैसे प्रमुख शब्द आते हैं।

Q7. “सत्यवाणी” इति विषयम् आधृत्य पञ्च संस्कृतवाक्यानि लिखत।

सत्यवाणी श्रेष्ठः गुणः अस्ति।
मनुष्येण सत्यपूतां वाचं वदेत्।
असत्यवाणी विश्वासं नाशयति।
सज्जनाः सत्यं वदन्ति।
सत्यवाणी धर्मस्य लक्षणम् अस्ति।

ये वाक्य Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 important questions में लेखन अभ्यास के लिए उपयोगी हैं।

Q8. “अभ्यासः” शब्देन द्वे संस्कृतवाक्ये लिखत।

अभ्यासेन सर्वाः क्रियाः सिध्यन्ति।
छात्रेण प्रतिदिनम् अभ्यासः करणीयः।

यह उत्तर सुभाषितरत्नभाण्डागार के श्लोक से जुड़ा है। पाठ में अभ्यास को सभी कलाओं की सिद्धि का साधन कहा गया है।

Q9. हिन्दी वाक्यस्य संस्कृते अनुवादं कुरुत: मनुष्य को सत्य बोलना चाहिए।

मनुष्येण सत्यं वक्तव्यम्।

यह वाक्य “सत्यपूतां वदेत् वाचम्” के भाव से जुड़ा है। वाणी शुद्ध और सत्य होनी चाहिए।

Q10. हिन्दी वाक्यस्य संस्कृते अनुवादं कुरुत: अभ्यास से कला सिद्ध होती है।

अभ्यासात् कला सिध्यति।

यह छोटा अनुवाद पाठ के चौथे श्लोक से जुड़ा है। “सकलाः कलाः अभ्यासात्” यही भाव देता है।

Q11. “विवेकः” शब्देन एकं संस्कृतवाक्यं रचयत।

विवेकः मनुष्यस्य रक्षणं करोति।

पाठ में अविवेक को परम आपदाओं का पद कहा गया है। इसलिए विवेकपूर्ण निर्णय आवश्यक है।

Q12. “उद्योगिनम्” शब्देन एकं संस्कृतवाक्यं लिखत।

लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति।

यह पञ्चतन्त्र के श्लोक का भाव है। लक्ष्मी परिश्रमी और साहसी व्यक्ति के पास आती है।

Section C: अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् – 25 Marks

अनुप्रयुक्त-व्याकरणम् में Class 9 Sanskrit sandhi practice, समास-विग्रह, अन्वय, रिक्तस्थान और प्रश्ननिर्माण पूछे जा सकते हैं। Sanskrit Sharada Chapter 6 extract practice के लिए श्लोकों के मूल शब्द और स्रोत याद रखें।

Q13. “दमोऽस्तेयम्” इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।

दमः + अस्तेयम् = दमोऽस्तेयम्।

यह शब्द धर्मलक्षण वाले श्लोक में आता है। अवग्रह का प्रयोग सन्धि के कारण हुआ है।

Q14. “पुराणमित्येव” इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।

पुराणम् + इति + एव = पुराणमित्येव।

यह मालविकाग्निमित्रम् के श्लोक में आता है। इसका भाव है कि केवल पुराना होने से कोई वस्तु श्रेष्ठ नहीं हो जाती।

Q15. “पुनरपि” इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।

पुनः + अपि = पुनरपि।

यह नीतिशतक के श्लोक में आता है। उत्तमजन विघ्नों से बार-बार बाधित होकर भी कार्य नहीं छोड़ते।

Q16. “चोत्तमजनाः” इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।

च + उत्तमजनाः = चोत्तमजनाः।

यह पद उत्तमजन के धैर्य को दिखाता है। श्लोक में कहा गया है कि वे कार्य प्रारम्भ कर छोड़ते नहीं।

Q17. “मनःपूतम्” इति समस्तपदस्य विग्रहं कुरुत।

मनसा पूतम्।

इसका अर्थ है मन से शुद्ध। पाठ का शीर्षक इसी पद पर आधारित है।

Q18. “वस्त्रपूतम्” इति पदस्य विग्रहं कुरुत।

वस्त्रेण पूतम्।

श्लोक में कहा गया है कि वस्त्र से छाना हुआ जल पीना चाहिए। यह सावधानी और शुद्धता का संकेत है।

Q19. “पुरुषसिंहम्” इति पदस्य विग्रहं कुरुत।

पुरुषः सिंहः इव, तम्।

यह पराक्रमी और परिश्रमी व्यक्ति के लिए आया है। लक्ष्मी ऐसे उद्योगी पुरुषसिंह के पास आती है।

Q20. “अविवेकः” इति पदस्य विग्रहं कुरुत।

न विवेकः।

इसका अर्थ है विचार का अभाव। किरातार्जुनीयम् में अविवेक को परम आपदाओं का स्थान कहा गया है।

Q21. रिक्तस्थानं पूरयत: सकलाः कलाः ______ सिध्यन्ति।

सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति।

यह चौथे श्लोक का अन्वय है। अभ्यास से क्रियाएँ, कलाएँ और ध्यान-मौन आदि सिद्ध होते हैं।

Q22. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत: लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति।

कम् उपैति लक्ष्मीः?

यह प्रश्न “उद्योगिनं पुरुषसिंहम्” पर आधारित है। उत्तर होगा — लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति।

Section D: पठित-अवबोधनम् – 30 Marks

पठित-अवबोधनम् में श्लोक, अन्वय, भावार्थ, स्रोतग्रन्थ, धर्मलक्षण और जीवनमूल्य पर प्रश्न आते हैं। Class 9 Sanskrit Chapter 6 questions answers में सुभाषितों का अर्थ और प्रयोग समझना जरूरी है।

Q23. “दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम्” इति पंक्तेः अर्थं लिखत।

इस पंक्ति का अर्थ है कि देखकर ही पैर रखना चाहिए।

यह श्लोक सावधानी, शुद्धता और विवेकपूर्ण आचरण सिखाता है। इसमें दृष्टिपूतं पादं, वस्त्रपूतं जलं, सत्यपूतां वाचं और मनःपूतं आचरण बताया गया है।

Q24. कीदृशी वाणी वक्‍तव्या?

सत्यपूता वाणी वक्‍तव्या।

अर्थात् वाणी सत्य से शुद्ध होनी चाहिए। यह पाठ का मुख्य नैतिक संदेश है।

Q25. धर्मस्य दशकं लक्षणं कानि?

धर्मस्य दशकं लक्षणं धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः च।

ये दस गुण मनुस्मृति में धर्मलक्षण के रूप में दिए गए हैं। पाठ इन्हें जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है।

Q26. लोकः कस्य आचरणम् अनुकरोति?

लोकः श्रेष्ठजनस्य आचरणम् अनुकरोति।

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक में कहा गया है कि श्रेष्ठ व्यक्ति जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वही करते हैं। इसलिए श्रेष्ठजन का व्यवहार आदर्श बनता है।

Q27. अभ्यासस्य महत्त्वं किम्?

अभ्यासेन सर्वाः क्रियाः और सकलाः कलाः सिद्ध होती हैं।

श्लोक कहता है कि अभ्यास से ध्यान और मौन आदि भी सिद्ध होते हैं। अभ्यास के लिए कुछ भी कठिन नहीं रहता।

Q28. उत्तमजनाः विघ्नेषु कथं व्यवहरन्ति?

उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनः बाधिताः अपि न परित्यजन्ति।

नीच लोग विघ्न के भय से कार्य आरम्भ नहीं करते। मध्यम लोग विघ्न आने पर रुक जाते हैं, पर उत्तमजन धैर्य रखते हैं।

Q29. “दैवं निहत्य कुरु पौरुषम्” इति पंक्तेः भावः कः?

इस पंक्ति का भाव है कि भाग्य पर निर्भर रहने के स्थान पर आत्मशक्ति से पुरुषार्थ करना चाहिए।

पञ्चतन्त्र का यह श्लोक परिश्रम और साहस को महत्व देता है। कायर लोग ही सब कुछ दैव पर छोड़ देते हैं।

Q30. “सहसा विदधीत न क्रियाम्” इति श्लोकस्य सारं लिखत।

इस श्लोक का सार है कि कोई भी कार्य बिना विचार के शीघ्रता में नहीं करना चाहिए।

अविवेक बड़ी विपत्तियों का कारण बनता है। विचारपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति को गुण चाहने वाली सम्पदाएँ स्वयं स्वीकार करती हैं।

NCERT Class 9 Sanskrit Sharada Chapter-Wise Questions

Chapter No. Chapter Name
Chapter 1 सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्
Chapter 2 सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः
Chapter 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
Chapter 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः
Chapter 5 एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी
Chapter 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
Chapter 8 अन्नाद् आनन्दं प्रति
Chapter 9 कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः
Chapter 10 णमो अरिहंताणम्
Chapter 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा २
Chapter 12 अन्वयः
Chapter 13 समासः
Chapter 14 वाच्यम्
Chapter 15 शब्दरूपाणि
Chapter 16 धातुरूपाणि

FAQs (Frequently Asked Questions)

मनःपूतं समाचरेत् means one should act with a purified mind. The chapter uses this phrase to teach that intention, thought and conduct should be clean before any action.

The ten धर्मलक्षणानि are धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम् and अक्रोधः. These are listed in the मनुस्मृति verse included in the chapter.

सहसा विदधीत न क्रियाम् means one should not act in haste. The line teaches that thoughtless action can lead to serious trouble.

दैवं निहत्य कुरु पौरुषम् means one should overcome dependence on fate and act with personal effort. The line gives importance to courage, work and self-strength.

मनःपूतं समाचरेत् quotes verses from मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता, सुभाषितरत्नभाण्डागार, नीतिशतकम्, पञ्चतन्त्रम्, मालविकाग्निमित्रम् and किरातार्जुनीयम्.