Class 11 Hindi Antral Chapter 1 Important Questions हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी

Class 11 Hindi Antral Chapter 1 introduces students to M. F. Husain’s childhood, school life and early artistic journey. The chapter helps CBSE students understand friendship, natural talent, artistic passion and family support through autobiographical writing.

हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी में मकबूल फिदा हुसैन के बचपन, बड़ौदा बोर्डिंग स्कूल, दोस्तों और चित्रकला के प्रति उनके गहरे लगाव का वर्णन है। दादा की मृत्यु के बाद मकबूल गुमसुम रहने लगे थे। इसलिए उनके पिता ने उन्हें बड़ौदा के बोर्डिंग स्कूल में भेजने का निर्णय लिया।

Class 11 Hindi Antral Chapter 1 Important Questions छात्रों को मकबूल के व्यक्तित्व, उनकी कला-प्रतिभा, स्केच बनाने की आदत, पहली ऑयल पेंटिंग और पिता की सोच को समझने में मदद करते हैं। इस पाठ से छात्र आत्मकथात्मक लेखन, शब्द-चित्र और व्यक्ति-निर्माण से जुड़े प्रश्नों का अभ्यास कर सकते हैं।

Key Takeaways

  • मकबूल: दादा की मृत्यु के बाद वे चुप और गुमसुम रहने लगे थे।
  • बोर्डिंग स्कूल: बड़ौदा के स्कूल में उन्हें छह घनिष्ठ मित्र मिले और उनकी प्रतिभा निखरी।
  • कला-प्रतिभा: ड्राइंग मास्टर की चिड़िया की हूबहू नकल बनाकर उन्होंने दस में दस अंक पाए।
  • पिता का समर्थन: पहले वे बेटे को बिज़नेसमैन बनाना चाहते थे, पर बाद में कला के लिए उसे स्वीकार किया।

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Revise the chapter in three parts:

First 10 minutes: मकबूल का बचपन, दादा की मृत्यु and बड़ौदा बोर्डिंग स्कूल

Next 10 minutes: पाँच मित्रों के शब्द-चित्र, स्कूल की घटनाएँ and मकबूल की चित्रकला

Final 10 minutes: रानीपुर बाज़ार, स्केच, पहली ऑयल पेंटिंग, बेंद्रे साहब and पिता की रोशनख़याली

Need help revising हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी के मुख्य प्रसंग?

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लघु उत्तरीय प्रश्न 2 अंक Class 11 Hindi Antral Chapter 1 Important Questions

इन प्रश्नों में दो से तीन पंक्तियों में उत्तर लिखें। उत्तर पाठ की घटना और सही संदर्भ से जुड़ा होना चाहिए।

Q1. मकबूल को बड़ौदा के बोर्डिंग स्कूल क्यों भेजा गया?

मकबूल के दादा का निधन हो गया था। इसके बाद वह गुमसुम रहने लगा और दादा के कमरे में ही बंद रहता था। इसलिए उसके अब्बा ने सोचा कि उसे बड़ौदा के बोर्डिंग स्कूल में डाल देना चाहिए।

Q2. मकबूल के अब्बा ने उसे चाचा के साथ क्या आदेश देकर भेजा?

अब्बा ने मकबूल को चाचा के हवाले किया और कहा कि उसे बड़ौदा छोड़ आओ। वहाँ लड़कों के साथ उसका मन लग जाएगा। साथ ही वह पढ़ाई, मज़हबी तालीम, रोज़ा, नमाज़ और अच्छे आचरण भी सीखेगा।

Q3. बड़ौदा शहर का वर्णन पाठ में कैसे किया गया है?

बड़ौदा को महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ का साफ-सुथरा शहर बताया गया है। शहर में प्रवेश करते ही “हिज़ हाइनेस” की पाँच धातुओं से बनी मूर्ति दिखाई देती थी। वह शानदार घोड़े पर सवार थी।

Q4. मकबूल जिस बोर्डिंग स्कूल में गया, वह कहाँ था?

मकबूल दारुत्तुलबा छात्रावास, मदरसा हुसामिया, सिंह बाई माता रोड, गैंडी गेट में रहा। यह सुलेमानी जमात का बोर्डिंग स्कूल था।

Q5. मकबूल की दोस्ती कितने लड़कों से हुई?

मकबूल की दोस्ती छह लड़कों से हुई। वे एक-दूसरे के बहुत करीब हो गए। दो साल की निकटता जीवन भर दिल की दूरी में नहीं बदल सकी।

Q6. मकबूल के मित्र मोहम्मद इब्राहीम गोहर अली का व्यक्तित्व कैसा था?

मोहम्मद इब्राहीम गोहर अली डभोई के अत्तार थे। उनका कद छोटा था और नजरें ठहरी हुई थीं। वे अंबर और मुश्क के अत्तर में डूबे गुणों के भंडार थे।

Q7. अरशद किसका बेटा था और उसका स्वभाव कैसा था?

अरशद डॉक्टर मनवरी का बेटा था। उसका चेहरा हमेशा हँसता रहता था। उसे गाने और खाने का शौक था और उसका शरीर पहलवानी था।

Q8. स्कूल में ड्राइंग मास्टर ने बच्चों से क्या बनाने को कहा?

ड्राइंग मास्टर मोहम्मद अतहर ने ब्लैकबोर्ड पर सफेद चॉक से एक बड़ी चिड़िया बनाई। उन्होंने लड़कों से अपनी-अपनी स्लेट पर उसकी नकल करने को कहा।

Q9. मकबूल को ड्राइंग में कितने अंक मिले?

मकबूल ने स्लेट पर चिड़िया की हूबहू नकल बना दी। उसे इस काम में दस में से दस अंक मिले।

Q10. दो अक्टूबर को मकबूल ने क्या बनाया?

दो अक्टूबर को स्कूल गांधी जी की सालगिरह मना रहा था। कक्षा शुरू होने से पहले मकबूल ने ब्लैकबोर्ड पर गांधी जी का पोर्ट्रेट बना दिया था।

लघु उत्तरीय प्रश्न 3 अंक हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी Question Answer

इन प्रश्नों में घटना, व्यक्तित्व और भाव को थोड़ा विस्तार दें। उत्तर में पाठ का प्रसंग जरूर जोड़ें।

Q1. मकबूल के पाँच मित्र अलग-अलग व्यक्तित्व वाले होते हुए भी घनिष्ठ मित्र कैसे थे?

मकबूल के मित्र अलग-अलग स्वभाव और पृष्ठभूमि के थे। कोई अत्तार बना, कोई रेडियो की आवाज़ बना, कोई कराची का नागरिक बना, कोई कुवैत पहुँचा और कोई कलाकार बना। फिर भी उनके बीच बचपन की निकटता बनी रही।

दो साल की मित्रता जीवन भर दिल की दूरी में नहीं बदली। इससे पता चलता है कि सच्ची मित्रता समान पेशे या समान दिशा से नहीं, बल्कि आत्मीयता और साथ बिताए समय से बनती है।

Q2. “प्रतिभा छिपाए नहीं छिपती” कथन मकबूल पर कैसे लागू होता है?

मकबूल बचपन से ही चित्रकला में असाधारण रुचि रखता था। स्कूल में ड्राइंग मास्टर ने ब्लैकबोर्ड पर चिड़िया बनाई, तो मकबूल ने स्लेट पर उसकी हूबहू नकल कर दी। उसे दस में से दस अंक मिले।

दो अक्टूबर को उसने गांधी जी का पोर्ट्रेट भी बना दिया। आगे चलकर दुकान पर बैठते हुए भी वह स्केच बनाता रहा। इससे स्पष्ट होता है कि उसकी प्रतिभा हर स्थिति में बाहर आ जाती थी।

Q3. “लेखक जन्मजात कलाकार है” यह बात सबसे पहले कहाँ प्रकट होती है?

यह बात सबसे पहले बोर्डिंग स्कूल में प्रकट होती है। ड्राइंग मास्टर मोहम्मद अतहर ने ब्लैकबोर्ड पर एक बड़ी चिड़िया बनाई और बच्चों से उसकी नकल करने को कहा। मकबूल की स्लेट पर वही चिड़िया हूबहू उतर आई।

यह घटना बताती है कि वह केवल अभ्यास से कलाकार नहीं बना। उसमें बचपन से ही देखने, पकड़ने और चित्र में बदलने की प्राकृतिक क्षमता थी।

Q4. मदरसे के सालाना जलसे में मकबूल ने क्या किया?

मदरसे के सालाना जलसे में मशहूर फोटोग्राफर लुकमानी ग्रुप फोटो खींच रहे थे। केवल खास मेहमानों और उस्तादों का फोटो लिया जा रहा था। मकबूल दूर लड़कों की भीड़ में खड़ा मौका देख रहा था।

जैसे ही लुकमानी ने फोकस जमाया और “रेडी” कहा, मकबूल दौड़कर ग्रुप के कोने में खड़ा हो गया। इस तरह उसने उस्तादों की अनुमति के बिना अपनी कई तस्वीरें खिंचवा लीं।

Q5. दुकान पर बैठते हुए मकबूल के भीतर का कलाकार किन कार्यों से प्रकट होता है?

मकबूल को छुट्टी के दिन चाचा की दुकान पर बैठाया जाता था ताकि वह बिज़नेस सीखे। पर उसका ध्यान दाम, कपड़ों की पहचान या सामान में नहीं लगता था। वह लगातार ड्राइंग और पेंटिंग में लगा रहता था।

वह दुकान के सामने से गुजरने वाली घूँघट वाली स्त्री, गेहूँ की बोरी उठाए मजदूर, पठान की दाढ़ी, माथे पर सजदे का निशान, बुर्का पहने औरत और बकरी के बच्चे जैसे दृश्य बनाता था। यही उसकी कलाकार-दृष्टि थी।

Q6. मकबूल ने पहली ऑयल पेंटिंग कैसे बनाई?

एक दिन दुकान के सामने से फिल्मी इश्तिहार का ताँगा गुज़रा। उसमें शांताराम की फिल्म सिंहगढ़ का पोस्टर था। मराठा योद्धा हाथ में खिंची तलवार और ढाल लिए था।

मकबूल का मन हुआ कि वह इसकी ऑयल पेंटिंग बनाए। उसके पास ऑयल कलर नहीं थे, इसलिए उसने अपनी दो स्कूल की किताबें बेचकर ऑयल कलर की ट्यूबें खरीदीं। फिर चाचा की दुकान पर बैठकर पहली ऑयल पेंटिंग बनाई।

Q7. मकबूल के पिता ने पहली ऑयल पेंटिंग देखकर क्या किया?

चाचा ने मकबूल की शिकायत उसके अब्बा तक पहुँचाई क्योंकि उसने किताबें बेचकर रंग खरीदे थे। अब्बा ने पेंटिंग देखी। पेंटिंग देखकर वे नाराज़ नहीं हुए।

उन्होंने बेटे को गले लगा लिया। यह घटना बताती है कि पिता ने मकबूल की कला-प्रतिभा को समझना शुरू कर दिया था।

Q8. बेंद्रे साहब से मकबूल की मुलाकात कैसे हुई?

मकबूल इंदौर सर्राफा बाज़ार के पास ताँबे-पीतल की दुकानों वाली गली में लैंडस्केप बना रहा था। वहीं बेंद्रे साहब भी ऑन-स्पॉट पेंटिंग कर रहे थे।

मकबूल को बेंद्रे साहब की तकनीक बहुत पसंद आई। वे टिंटेड पेपर पर गोआश वाटर कलर से काम करते थे। इस मुलाकात के बाद मकबूल अक्सर उनके साथ लैंडस्केप पेंट करने जाने लगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 5 अंक Class 11 Hindi Antral Chapter 1

इन प्रश्नों में घटना, संदर्भ, व्यक्तित्व-चित्रण और पाठ का मुख्य भाव साथ लेकर उत्तर लिखें।

Q1. मकबूल के बड़ौदा बोर्डिंग स्कूल जीवन का वर्णन कीजिए।

दादा की मृत्यु के बाद मकबूल गुमसुम रहने लगा था। वह दादा के कमरे में बंद रहता था, उनके बिस्तर पर सोता था और उनकी भूरी अचकन ओढ़ता था। घर में वह किसी से बात नहीं करता था।

उसके अब्बा ने सोचा कि उसे बड़ौदा के बोर्डिंग स्कूल में दाखिल करा देना चाहिए। वहाँ लड़कों के साथ उसका मन लगेगा और वह पढ़ाई के साथ मज़हबी तालीम, रोज़ा, नमाज़ और अच्छे आचरण सीखेगा।

मकबूल को दारुत्तुलबा छात्रावास, मदरसा हुसामिया में छोड़ा गया। वहाँ उसकी दोस्ती छह लड़कों से हुई। ये मित्र अलग-अलग स्वभाव और भविष्य वाले थे, पर उनके बीच गहरी आत्मीयता रही।

स्कूल में मकबूल की कला-प्रतिभा भी सामने आई। उसने ड्राइंग मास्टर की बनाई चिड़िया की हूबहू नकल बनाई और गांधी जी का पोर्ट्रेट भी बनाया। इस तरह बोर्डिंग स्कूल उसके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बना।

Q2. मकबूल के मित्रों के शब्द-चित्रों से उनके व्यक्तित्व की झलक कैसे मिलती है?

लेखक ने अपने मित्रों के छोटे-छोटे शब्द-चित्र दिए हैं। मोहम्मद इब्राहीम गोहर अली डभोई के अत्तार थे। वे छोटे कद के, ठहरी नजरों वाले और अत्तर की खुशबू में डूबे गुणों के भंडार थे।

अरशद हमेशा हँसते चेहरे वाला था। उसे गाने और खाने का शौक था और उसका शरीर पहलवानी था। हामिद कांबर हुसैन कुश्ती, दंड-बैठक, गप्प और बात में बात मिलाने में उस्ताद था।

अब्बासजी अहमद का शरीर गठा हुआ था। उनका रंग खुला था और हँसने का अंदाज दिलकश था। अब्बास अली फिदा नर्म लहजे, ऊँचे माथे, समय की पाबंदी और पढ़ने की आदत वाला था।

ये सभी मित्र अलग-अलग प्रकृति के थे। फिर भी उनमें बचपन की गहरी निकटता थी। लेखक के शब्द-चित्र उनकी बाहरी बनावट के साथ उनके स्वभाव को भी सामने लाते हैं।

Q3. दुकान पर बैठते हुए भी मकबूल का कलाकार कैसे जीवित रहा?

मकबूल को छुट्टियों में चाचा की दुकान पर बैठाया जाता था। परिवार चाहता था कि वह शुरू से बिज़नेस के गुण सीखे। पर दुकान पर बैठकर भी उसका ध्यान ड्राइंग और पेंटिंग में ही रहता था।

उसे चीज़ों की कीमतें याद नहीं रहती थीं। कपड़ों की पहचान भी उसे नहीं आती थी। पर चाचा के होटल में घूमती चाय की प्यालियों की गिनती और पहाड़े उसे ज़बानी याद रहते थे। हिसाब में दस रुपये लिखता, तो किताब में बीस स्केच बना देता।

वह दुकान के सामने से गुजरते लोगों और दृश्यों के स्केच बनाता था। घूँघट वाली स्त्री, मजदूर, पठान, बुर्का पहने औरत, बकरी का बच्चा, सब उसकी चित्र-दृष्टि का हिस्सा बन जाते थे।

इससे स्पष्ट होता है कि दुकान भी उसके लिए कला-विद्यालय बन गई थी। व्यापार सीखने की जगह उसने जीवन और लोगों को चित्रों में पकड़ना सीखा।

Q4. फिल्मी पोस्टर से प्रेरित होकर मकबूल ने अपनी पहली ऑयल पेंटिंग कैसे बनाई?

एक दिन रानीपुर बाज़ार में मकबूल चाचा की दुकान पर था। दुकान के सामने से फिल्मी इश्तिहार का ताँगा गुज़रा। उस समय साइलेंट फिल्मों के विज्ञापन ताँगे में ब्रास बैंड के साथ गलियों से गुजरते थे।

मकबूल ने शांताराम की फिल्म सिंहगढ़ का पोस्टर देखा। उसमें मराठा योद्धा हाथ में तलवार और ढाल लिए था। इस पोस्टर ने उसे बहुत प्रभावित किया।

उसने सोचा कि इसकी ऑयल पेंटिंग बनाई जाए। उसके पास ऑयल कलर नहीं थे और अब्बा उसे रंग-रोगन दिलाने के पक्ष में नहीं थे। इसलिए उसने अपनी दो स्कूल की किताबें, शायद भूगोल और इतिहास, बेचकर ऑयल कलर की ट्यूबें खरीद लीं।

उसने पहली ऑयल पेंटिंग चाचा की दुकान पर बैठकर बनाई। चाचा ने नाराज़ होकर शिकायत की, पर अब्बा ने पेंटिंग देखकर बेटे को गले लगा लिया। यह घटना मकबूल की कला-लगन और पिता के बदलते दृष्टिकोण को दिखाती है।

Q5. बेंद्रे साहब की मुलाकात ने मकबूल की कला-यात्रा को कैसे प्रभावित किया?

मकबूल की बेंद्रे साहब से मुलाकात इंदौर के सर्राफा बाज़ार के पास हुई। मकबूल ताँबे-पीतल की दुकानों वाली गली में लैंडस्केप बना रहा था। वहीं बेंद्रे साहब भी ऑन-स्पॉट पेंटिंग कर रहे थे।

मकबूल को बेंद्रे साहब की तकनीक बहुत पसंद आई। वे टिंटेड पेपर पर गोआश वाटर कलर का प्रयोग करते थे। इस मुलाकात के बाद मकबूल अक्सर उनके साथ लैंडस्केप पेंट करने जाने लगा।

बेंद्रे साहब ने बाद में मकबूल के काम पर उसके पिता से बात की। अगले ही दिन पिता ने बंबई से विंसर न्यूटन ऑयल ट्यूब और कैनवस मँगाने का ऑर्डर भेज दिया।

इससे मकबूल की कला-यात्रा को परिवार की स्वीकृति और आवश्यक साधन मिले। बेंद्रे साहब का मार्गदर्शन और पिता का समर्थन, दोनों उसके कलाकार जीवन के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुए।

Q6. मकबूल के पिता के व्यक्तित्व की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

मकबूल के पिता पहले अपने बेटे को बिज़नेसमैन बनाना चाहते थे। वे उसे छुट्टी के दिन दुकान पर बैठने भेजते थे ताकि वह व्यापार के गुण सीख सके। यह उस समय की सामान्य सोच थी।

पर जब उन्होंने बेटे की पेंटिंग देखी, तो वे केवल नाराज़ पिता नहीं बने। उन्होंने मकबूल की प्रतिभा को पहचाना और उसे गले लगा लिया। यह उनके मन के बदलाव और संवेदनशीलता को दिखाता है।

बेंद्रे साहब ने भी जब मकबूल के काम की चर्चा की, तो पिता ने परंपरागत बंधन तोड़ दिए। उन्होंने बंबई से ऑयल ट्यूब और कैनवस मँगवाने का ऑर्डर भेज दिया।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता रोशनख़याली थी। कपड़ा मिल के वातावरण, काज़ी-मौलवियों के पड़ोस और पुराने विचारों के दौर में उन्होंने बेटे को कला की राह चुनने दी। यह उनके खुले दिमाग और दूरदृष्टि का प्रमाण है।

Q7. “बेटा जाओ, और ज़िंदगी को रंगों से भर दो” कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

यह कथन मकबूल के पिता की रोशनख़याली और स्वीकृति का प्रतीक है। पहले वे चाहते थे कि मकबूल बिज़नेस सीखे। लेकिन मकबूल का मन रंगों, स्केच और पेंटिंग में था।

जब पिता ने उसकी प्रतिभा को पहचाना, तो उन्होंने उसे रोकने के बजाय आगे बढ़ाया। उन्होंने परंपरागत बंधन तोड़ दिए और बेटे को कला की राह चुनने दी।

“ज़िंदगी को रंगों से भर दो” का अर्थ है कि मकबूल केवल चित्र न बनाए, बल्कि अपने जीवन को कला से सार्थक करे। यह वाक्य पिता के प्रेम, विश्वास और उदार दृष्टि को व्यक्त करता है।

यह कथन पाठ का महत्वपूर्ण संदेश भी है। प्रतिभा को दबाया नहीं जाना चाहिए, उसे सही दिशा और समर्थन मिलना चाहिए।

Q8. हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी पाठ की भाषा-शैली की विशेषताएँ लिखिए।

इस पाठ की भाषा आत्मकथात्मक, चित्रात्मक और जीवंत है। लेखक अपने बचपन और कला-यात्रा की घटनाओं को ऐसे लिखता है जैसे दृश्य सामने घट रहे हों। शब्द-चित्र बहुत प्रभावशाली हैं।

मित्रों का वर्णन छोटे-छोटे संकेतों से किया गया है। किसी की नजर, किसी का लहजा, किसी की हँसी, किसी का शरीर और किसी की आदत, सब मिलकर चरित्र बना देते हैं।

पाठ में उर्दू, हिंदी और बोलचाल के शब्द स्वाभाविक रूप से आते हैं। इससे भाषा में आत्मीयता और समय का वातावरण बनता है।

कला से जुड़े प्रसंग, जैसे स्केच, पोर्ट्रेट, ऑयल पेंटिंग, लैंडस्केप और कैनवस, पाठ को कलाकार के विकास की कहानी बनाते हैं। शैली सरल है, पर दृश्य बहुत यादगार बनते हैं।

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FAQs (Frequently Asked Questions)

बोर्डिंग स्कूल ने मकबूल को गुमसुम अवस्था से बाहर निकाला। वहाँ उसे मित्र मिले, पढ़ाई का वातावरण मिला और उसकी चित्रकला सामने आई। इसी दौर में उसकी प्रतिभा पहचानी जाने लगी।

ड्राइंग मास्टर ने ब्लैकबोर्ड पर चिड़िया बनाई और बच्चों से नकल करने को कहा। मकबूल ने अपनी स्लेट पर वैसी ही चिड़िया बना दी। यह उसकी जन्मजात चित्र-दृष्टि का पहला स्पष्ट संकेत है।

दुकान पर बैठते हुए भी मकबूल लोगों, चीज़ों और दृश्यों के स्केच बनाता था। उसने मजदूर, स्त्री, पठान और बकरी के बच्चे जैसे दृश्य बनाए। इसलिए दुकान उसके लिए जीवन को देखने और चित्रित करने की जगह बन गई।

वे पहले बेटे को व्यापार में लाना चाहते थे, पर बाद में उसकी कला-प्रतिभा को पहचान गए। उन्होंने उसे रोकने के बजाय रंग और कैनवस दिलाए। यह उनकी रोशनख़याली और दूरदृष्टि दिखाता है।

इस अध्याय से मकबूल का बोर्डिंग स्कूल जीवन, पाँच मित्रों के शब्द-चित्र, जन्मजात कला-प्रतिभा, दुकान के स्केच, पहली ऑयल पेंटिंग, बेंद्रे साहब और पिता की रोशनख़याली पर प्रश्न आ सकते हैं।