“श्रम विभाजन और जाति-प्रथा” में डॉ. भीमराव आंबेडकर जाति-व्यवस्था को श्रम-विभाजन नहीं, श्रमिक-विभाजन बताते हैं।
Important Questions Class 12 Hindi Aroh Chapter 15 में जाति-प्रथा, स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता, दासता और आदर्श समाज से जुड़े प्रश्न शामिल हैं।
“श्रम विभाजन और जाति-प्रथा” तथा “मेरी कल्पना का आदर्श समाज” डॉ. भीमराव आंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण “Annihilation of Caste” के हिंदी रूपांतर से लिए गए प्रतिनिधि अंश हैं। इस पाठ में आंबेडकर जाति-प्रथा को सामाजिक, आर्थिक और मानवीय दृष्टि से हानिकारक बताते हैं। वे कहते हैं कि जाति-प्रथा व्यक्ति की रुचि, क्षमता और स्वतंत्रता के अनुसार पेशा चुनने का अधिकार छीन लेती है। पाठ का दूसरा भाग आंबेडकर के आदर्श समाज को स्पष्ट करता है, जो स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित है। 2026-27 परीक्षा के लिए यह पाठ तर्क, विचार, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
Key Takeaways
- मुख्य तर्क: जाति-प्रथा केवल श्रम-विभाजन नहीं, श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन है।
- पेशा: जाति-प्रथा व्यक्ति का पेशा जन्म से तय कर देती है।
- दासता: आंबेडकर के अनुसार, दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं है।
- आदर्श समाज: आंबेडकर का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित है।
Important Questions Class 12 Hindi Aroh Chapter 15 Structure 2026-27
| Question Type |
Marks |
Best Answer Style |
| Objective Type |
1 mark |
लेखक, विचार, संकल्पना या सही विकल्प |
| Very Short Answer |
2 marks |
सीधा उत्तर और एक कारण |
| Short Answer |
3 marks |
तर्क, उदाहरण और निष्कर्ष |
| Long Answer |
5 marks |
विचार, सामाजिक संदर्भ और विश्लेषण |
| Extract-Based |
4 marks |
संदर्भ, अर्थ और लेखक का दृष्टिकोण |
Objective Type Questions from Important Questions Class 12 Hindi Aroh Chapter 15
Objective questions में लेखक, पाठ का स्रोत, जाति-प्रथा, श्रम-विभाजन, दासता, समता और आदर्श समाज से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं। उत्तर तथ्य-आधारित और स्पष्ट रखें।

Q1. “श्रम विभाजन और जाति-प्रथा” पाठ के लेखक कौन हैं?
- रघुवीर सहाय
b. डॉ. भीमराव आंबेडकर
c. शमशेर बहादुर सिंह
d. हजारी प्रसाद द्विवेदी
Answer: b. डॉ. भीमराव आंबेडकर
डॉ. भीमराव आंबेडकर भारतीय संविधान के निर्माता और सामाजिक न्याय के प्रमुख चिंतक थे।
Q2. यह पाठ किस प्रसिद्ध भाषण से लिया गया है?
- हिंद स्वराज
b. Annihilation of Caste
c. Discovery of India
d. Gitanjali
Answer: b. Annihilation of Caste
यह पाठ “Annihilation of Caste” के हिंदी रूपांतर से लिया गया है।
Q3. आंबेडकर जाति-प्रथा को क्या मानते हैं?
- प्राकृतिक श्रम-विभाजन
b. श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन
c. केवल धार्मिक अनुष्ठान
d. आर्थिक प्रगति का साधन
Answer: b. श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन
वे कहते हैं कि जाति-प्रथा श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन भी करती है।
Q4. जाति-प्रथा पेशे का निर्धारण किस आधार पर करती है?
- व्यक्ति की रुचि पर
b. व्यक्ति की क्षमता पर
c. माता-पिता के सामाजिक स्तर और जन्म पर
d. आधुनिक शिक्षा पर
Answer: c. माता-पिता के सामाजिक स्तर और जन्म पर
जाति-प्रथा व्यक्ति का पेशा जन्म से तय कर देती है।
Q5. आंबेडकर के अनुसार, कुशल समाज के लिए क्या आवश्यक है?
- व्यक्ति को अपना पेशा स्वयं चुनने की स्वतंत्रता
b. हर व्यक्ति को पैतृक पेशे में बाँधना
c. पेशे को जन्म से तय करना
d. शिक्षा को सीमित रखना
Answer: a. व्यक्ति को अपना पेशा स्वयं चुनने की स्वतंत्रता
व्यक्ति की क्षमता तभी विकसित होती है जब उसे अपना काम चुनने का अवसर मिले।
Q6. जाति-प्रथा किसका प्रमुख कारण बनती है?
- बेरोजगारी
b. जलवायु परिवर्तन
c. विदेशी व्यापार
d. पर्यटन
Answer: a. बेरोजगारी
पेशा बदलने की स्वतंत्रता न होने से जाति-प्रथा बेरोजगारी का कारण बनती है।
Q7. आंबेडकर के आदर्श समाज के तीन तत्व कौन-से हैं?
- धन, शक्ति और सत्ता
b. स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता
c. युद्ध, विजय और शासन
d. धर्म, कर्म और भाग्य
Answer: b. स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता
ये तीनों तत्व लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण समाज के आधार हैं।
Q8. आंबेडकर लोकतंत्र को क्या मानते हैं?
- केवल शासन की पद्धति
b. सामूहिक जीवनचर्या की रीति
c. केवल चुनाव व्यवस्था
d. केवल कानून की किताब
Answer: b. सामूहिक जीवनचर्या की रीति
वे लोकतंत्र को समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान से जोड़ते हैं।
Q9. आंबेडकर के अनुसार, दासता का व्यापक अर्थ क्या है?
- केवल कानूनी पराधीनता
b. दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों को मानने की विवशता
c. केवल गरीबी
d. केवल अशिक्षा
Answer: b. दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों को मानने की विवशता
दासता कानूनी पराधीनता के बिना भी हो सकती है।
Q10. “पूर्व लेख” का अर्थ पाठ में क्या है?
- पहले से तय सामाजिक व्यवस्था
b. नया संविधान
c. पुराना अखबार
d. यात्रा-वृत्तांत
Answer: a. पहले से तय सामाजिक व्यवस्था
जाति-प्रथा व्यक्ति के काम को जन्म से निर्धारित कर देती है।
Q11. आंबेडकर के चिंतन पर किन तीन व्यक्तियों का प्रभाव बताया गया है?
- बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले
b. तुलसी, सूर और मीरा
c. गांधी, नेहरू और पटेल
d. कालिदास, भवभूति और बाणभट्ट
Answer: a. बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले
इन तीनों ने आंबेडकर की सामाजिक दृष्टि को प्रभावित किया।
Q12. आंबेडकर ने 1956 में किस धर्म को अपनाया?
- जैन धर्म
b. बौद्ध धर्म
c. ईसाई धर्म
d. इस्लाम
Answer: b. बौद्ध धर्म
उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया।
Q13. जाति-प्रथा किस बात को दबाती है?
- मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा और आत्म-शक्ति
b. वर्षा
c. व्यापारिक कर
d. परिवहन व्यवस्था
Answer: a. मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा और आत्म-शक्ति
आंबेडकर के अनुसार, जाति-प्रथा व्यक्ति को अस्वाभाविक नियमों में जकड़ देती है।
Q14. आंबेडकर समता को क्या मानते हैं?
- असंभव इसलिए अनुपयोगी
b. व्यवहार का नियामक सिद्धांत
c. केवल धार्मिक विचार
d. केवल राजनीतिक नारा
Answer: b. व्यवहार का नियामक सिद्धांत
वे मानते हैं कि समता व्यवहार की व्यावहारिक कसौटी है।
Q15. Assertion: आंबेडकर जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन नहीं मानते।
Reason: जाति-प्रथा व्यक्ति की रुचि और क्षमता के बजाय जन्म के आधार पर पेशा तय करती है।
- Assertion और Reason दोनों सही हैं, और Reason Assertion को समझाता है
b. दोनों सही हैं, पर Reason Assertion को नहीं समझाता
c. Assertion सही है, Reason गलत है
d. Assertion गलत है, Reason सही है
Answer: a. Assertion और Reason दोनों सही हैं, और Reason Assertion को समझाता है
जाति-प्रथा श्रम नहीं, मनुष्यों को जन्म के आधार पर बाँटती है।
Very Short Answer Questions from Class 12 Hindi Aroh Chapter 15 Question Answer
Very short answer questions में लेखक, पाठ का तर्क, जाति-प्रथा, दासता और आदर्श समाज से जुड़े प्रश्न आते हैं। उत्तर दो-तीन वाक्यों में लिखें।
Q16. “श्रम विभाजन और जाति-प्रथा” पाठ का मुख्य विषय क्या है?
इस पाठ का मुख्य विषय जाति-प्रथा की आलोचना है। आंबेडकर बताते हैं कि जाति-प्रथा श्रम-विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का अस्वाभाविक और ऊँच-नीच वाला विभाजन है।
Q17. आंबेडकर जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन क्यों नहीं मानते?
आंबेडकर जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन नहीं मानते क्योंकि यह व्यक्ति की रुचि और क्षमता पर आधारित नहीं है। यह जन्म और माता-पिता के सामाजिक स्तर के आधार पर पेशा तय करती है।
Q18. जाति-प्रथा को श्रमिक-विभाजन क्यों कहा गया है?
जाति-प्रथा अलग-अलग कामों को बाँटने के साथ श्रमिकों को भी जन्म-आधारित वर्गों में बाँट देती है। वह इन वर्गों को ऊँच-नीच के क्रम में रखती है।
Q19. जाति-प्रथा बेरोजगारी का कारण कैसे बनती है?
जाति-प्रथा व्यक्ति को पैतृक पेशे में बाँध देती है। यदि वह पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त हो, तब भी व्यक्ति आसानी से दूसरा पेशा नहीं चुन सकता। इससे बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ती है।
Q20. आंबेडकर के अनुसार दासता क्या है?
आंबेडकर के अनुसार दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं है। जब व्यक्ति को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों को निभाने के लिए विवश किया जाए, तब भी वह दासता है।
Q21. आंबेडकर का आदर्श समाज कैसा है?
आंबेडकर का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित है। उसमें सामाजिक संपर्क, परस्पर सम्मान और साझा अनुभवों का आदान-प्रदान होना चाहिए।
Q22. आंबेडकर लोकतंत्र को कैसे समझते हैं?
आंबेडकर लोकतंत्र को केवल शासन की पद्धति नहीं मानते। उनके अनुसार लोकतंत्र सामूहिक जीवनचर्या की रीति और समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है।
Short Answer Questions from Shram Vibhajan aur Jati Pratha Question Answer
Short answer questions में आंबेडकर के तर्क, जाति-प्रथा की आलोचना और आदर्श समाज की संकल्पना पूछी जाती है। उत्तर में पाठ के विचारों को क्रम से रखें।
Q23. जाति-प्रथा श्रम-विभाजन से किस प्रकार अलग है?
श्रम-विभाजन किसी भी सभ्य समाज की आवश्यकता हो सकता है।
लेकिन जाति-प्रथा केवल कामों का विभाजन नहीं करती। वह काम करने वाले लोगों को भी जन्म के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बाँट देती है। फिर इन वर्गों को ऊँच-नीच में रखती है।
श्रम-विभाजन क्षमता और रुचि पर आधारित हो सकता है। जाति-प्रथा व्यक्ति को बिना उसकी योग्यता देखे पैतृक पेशे में बाँध देती है।
इसीलिए आंबेडकर जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन नहीं मानते।
Q24. जाति-प्रथा व्यक्ति की क्षमता और रुचि को कैसे दबाती है?
जाति-प्रथा व्यक्ति को जन्म से तय पेशे में बाँध देती है।
वह नहीं देखती कि व्यक्ति की रुचि किस काम में है। वह यह भी नहीं देखती कि व्यक्ति किस काम में कुशल हो सकता है। इस कारण बहुत से लोग ऐसे काम करते हैं जिनमें उनका मन और बुद्धि नहीं लगती।
आंबेडकर के अनुसार, ऐसी स्थिति कार्य-कुशलता को नष्ट करती है और मनुष्य की आत्म-शक्ति को दबा देती है।
Q25. जाति-प्रथा आर्थिक दृष्टि से हानिकारक क्यों है?
जाति-प्रथा आर्थिक दृष्टि से हानिकारक है क्योंकि वह पेशा बदलने की स्वतंत्रता नहीं देती।
आधुनिक युग में उद्योग और तकनीक लगातार बदलते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति को काम बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। जाति-प्रथा उसे पैतृक पेशे से बाहर जाने की अनुमति नहीं देती।
इससे बेरोजगारी, भुखमरी और कम कार्य-कुशलता बढ़ती है।
Q26. आंबेडकर के अनुसार आदर्श समाज में गतिशीलता क्यों जरूरी है?
आदर्श समाज में गतिशीलता इसलिए जरूरी है कि परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँच सके।
समाज में कई प्रकार के हित होते हैं। हर व्यक्ति को उन हितों में भाग लेना और उनकी रक्षा के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
यदि समाज स्थिर और बंद हो जाए, तो समानता और स्वतंत्रता कमजोर हो जाती हैं।
Q27. भ्रातृता को आंबेडकर ने क्यों महत्वपूर्ण माना है?
भ्रातृता का अर्थ है भाईचारा, परस्पर सम्मान और साझा जीवन-बोध।
आंबेडकर के अनुसार, आदर्श समाज में लोगों के बीच दूध-पानी जैसे मेल का संबंध होना चाहिए। समाज में अबाध संपर्क, सहयोग और सम्मान होना जरूरी है।
भ्रातृता के बिना स्वतंत्रता और समता टिकाऊ नहीं हो सकतीं।
Q28. आंबेडकर स्वतंत्रता को किन अर्थों में देखते हैं?
आंबेडकर स्वतंत्रता को केवल आने-जाने या शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं रखते।
वे संपत्ति, आजीविका के साधन, शरीर को स्वस्थ रखने के साधन और अपनी शक्ति के प्रभावी उपयोग की स्वतंत्रता को भी महत्वपूर्ण मानते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति को अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
Q29. समता को आंबेडकर व्यावहारिक सिद्धांत क्यों मानते हैं?
आंबेडकर स्वीकार करते हैं कि सभी मनुष्य क्षमता, जन्म-परिस्थिति और प्रयास में समान नहीं होते।
फिर भी समाज और राजनीति में सबके साथ समान व्यवहार का सिद्धांत जरूरी है। नेता या समाज हर व्यक्ति की अलग परिस्थितियों को पूरी तरह नहीं जान सकता।
इसलिए समता व्यवहार का सबसे व्यावहारिक और न्यायपूर्ण सिद्धांत है।
Q30. आंबेडकर की दृष्टि में जाति-प्रथा मानवीय गरिमा के विरुद्ध कैसे है?
जाति-प्रथा मनुष्य को स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में नहीं देखती।
वह उसे जन्म, जाति और पैतृक पेशे से बाँधती है। उसके चुनाव, क्षमता, रुचि और सम्मान को महत्व नहीं देती।
इसलिए जाति-प्रथा मनुष्य की स्वतंत्रता, समता और गरिमा के विरुद्ध है।
Long Answer Questions from Important Questions Class 12 Hindi Aroh Chapter 15
Long answer questions में पाठ के विचार, तर्क और सामाजिक अर्थ को जोड़कर उत्तर लिखें। उत्तर में आंबेडकर की दृष्टि और आधुनिक संदर्भ दोनों शामिल करें।
Q31. आंबेडकर ने जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन मानने से क्यों इंकार किया है?
आंबेडकर जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन मानने से इंकार करते हैं क्योंकि उनके अनुसार यह तर्क अधूरा और भ्रामक है।
श्रम-विभाजन किसी भी सभ्य समाज की आवश्यकता हो सकता है। अलग-अलग लोग अलग-अलग काम करते हैं, ताकि समाज की जरूरतें पूरी हों। लेकिन जाति-प्रथा केवल काम नहीं बाँटती। वह मनुष्यों को जन्म-आधारित वर्गों में बाँटती है।
जाति-प्रथा की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह इन वर्गों को ऊँच-नीच में रखती है। यह दुनिया के किसी स्वस्थ श्रम-विभाजन जैसा नहीं है।
इसके अलावा, जाति-प्रथा व्यक्ति की रुचि और क्षमता नहीं देखती। वह पेशा जन्म से तय कर देती है। इससे व्यक्ति अपने योग्य काम का चुनाव नहीं कर पाता।
इसलिए आंबेडकर कहते हैं कि जाति-प्रथा श्रम-विभाजन नहीं, श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन है।
Q32. जाति-प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी और भुखमरी का कारण कैसे बनती है?
आंबेडकर के अनुसार, जाति-प्रथा बेरोजगारी और भुखमरी का कारण बनती है क्योंकि यह व्यक्ति को पेशा बदलने की स्वतंत्रता नहीं देती।
आधुनिक समाज में उद्योग, तकनीक और आर्थिक स्थितियाँ लगातार बदलती रहती हैं। कई बार किसी व्यक्ति का पारंपरिक काम अनुपयुक्त या अपर्याप्त हो जाता है। ऐसे समय में उसे दूसरा काम चुनने की आवश्यकता होती है।
लेकिन जाति-प्रथा कहती है कि व्यक्ति को वही पेशा करना चाहिए जो उसका पैतृक पेशा है। भले ही वह उसमें कुशल हो या नहीं। भले ही उस पेशे से उसका जीवन न चल सके।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति भूख, गरीबी और बेरोजगारी का शिकार हो सकता है। उसका मन और बुद्धि भी काम में नहीं लगती।
इस तरह जाति-प्रथा आर्थिक प्रगति और कार्य-कुशलता दोनों को रोकती है।
Q33. आंबेडकर के अनुसार दासता की व्यापक परिभाषा स्पष्ट कीजिए।
आंबेडकर दासता को केवल कानूनी पराधीनता नहीं मानते।
सामान्य रूप से लोग दासता को उस स्थिति से जोड़ते हैं जिसमें कोई व्यक्ति कानूनन किसी दूसरे का गुलाम हो। लेकिन आंबेडकर इसकी व्यापक परिभाषा देते हैं।
उनके अनुसार, दासता वह स्थिति भी है जिसमें कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़े। यह स्थिति कानूनी गुलामी के बिना भी हो सकती है।
जाति-प्रथा में व्यक्ति अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशा अपनाने के लिए बाध्य होता है। वह अपने जीवन का चुनाव स्वयं नहीं कर पाता।
इसलिए आंबेडकर के लिए दासता सामाजिक और मानसिक बंधन भी है। यह मनुष्य की स्वतंत्रता और गरिमा को नष्ट करती है।
Q34. आंबेडकर के आदर्श समाज की विशेषताएँ लिखिए।
आंबेडकर का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित है।
ऐसे समाज में गतिशीलता होनी चाहिए। कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँच सके। समाज में अलग-अलग हितों में सबकी भागीदारी होनी चाहिए।
सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के साधन और अवसर होने चाहिए। लोगों के बीच भाईचारा, सम्मान और सहयोग होना चाहिए। आंबेडकर इसे दूध-पानी के मिश्रण जैसा वास्तविक मेल मानते हैं।
स्वतंत्रता का अर्थ केवल आने-जाने की आजादी नहीं है। व्यक्ति को अपना व्यवसाय चुनने और अपनी क्षमता का विकास करने का अधिकार भी होना चाहिए।
समता का अर्थ है समाज में सबको समान अवसर और समान व्यवहार मिलना। यही लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद है।
Q35. स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता के आधार पर आंबेडकर का लोकतंत्र-विचार स्पष्ट कीजिए।
आंबेडकर लोकतंत्र को केवल शासन की पद्धति नहीं मानते।
उनके अनुसार, लोकतंत्र सामूहिक जीवनचर्या की रीति है। यह समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब लोगों में सम्मान, संवाद और साझेदारी हो।
स्वतंत्रता व्यक्ति को अपना जीवन और पेशा चुनने का अधिकार देती है। समता सबको समान अवसर और समान व्यवहार देती है। भ्रातृता लोगों को परस्पर सम्मान और सहयोग से जोड़ती है।
यदि स्वतंत्रता हो लेकिन समता न हो, तो समाज में विशेषाधिकार बढ़ेंगे। यदि समता हो लेकिन भ्रातृता न हो, तो समाज में वास्तविक मेल नहीं बनेगा।
इसलिए आंबेडकर के लोकतंत्र में ये तीनों तत्व साथ-साथ जरूरी हैं।
Extract-Based Questions from Shram Vibhajan aur Jati Pratha
Extract-based questions में संदर्भ, मुख्य तर्क और लेखक का दृष्टिकोण साफ़ लिखें। उत्तर छोटे पर अर्थपूर्ण रखें।
Q36. Read the extract and answer the questions.
“जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है।”
Q36(a). यह कथन किस पाठ से लिया गया है?
यह कथन “श्रम विभाजन और जाति-प्रथा” पाठ से लिया गया है।
इसके लेखक डॉ. भीमराव आंबेडकर हैं।
Q36(b). “श्रमिक-विभाजन” से क्या अर्थ है?
“श्रमिक-विभाजन” का अर्थ है काम करने वाले मनुष्यों को अलग-अलग वर्गों में बाँटना।
जाति-प्रथा यह विभाजन जन्म के आधार पर करती है।
Q36(c). लेखक जाति-प्रथा को दोषपूर्ण क्यों मानते हैं?
लेखक इसे दोषपूर्ण मानते हैं क्योंकि यह व्यक्ति की क्षमता और रुचि नहीं देखती।
यह मनुष्य को पैतृक पेशे में बाँध देती है।
Q36(d). इस कथन का मुख्य तर्क क्या है?
मुख्य तर्क यह है कि जाति-प्रथा केवल काम नहीं बाँटती।
वह मनुष्यों को ऊँच-नीच में बाँटती है।
Q37. Read the extract and answer the questions.
“जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्व-निर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है।”
Q37(a). “पूर्व-निर्धारण” का क्या अर्थ है?
“पूर्व-निर्धारण” का अर्थ है पहले से तय कर देना।
यहाँ इसका अर्थ जन्म के आधार पर पेशा तय करना है।
Q37(b). जाति-प्रथा व्यक्ति को किसमें बाँध देती है?
जाति-प्रथा व्यक्ति को जीवन-भर एक पैतृक पेशे में बाँध देती है।
वह अपना काम स्वतंत्र रूप से नहीं चुन पाता।
Q37(c). इससे कौन-सी समस्या पैदा होती है?
इससे बेरोजगारी और भुखमरी की समस्या पैदा हो सकती है।
अनुपयुक्त पेशे में व्यक्ति की क्षमता भी नष्ट होती है।
Q37(d). लेखक का दृष्टिकोण कैसा है?
लेखक का दृष्टिकोण आलोचनात्मक और सुधारवादी है।
वे व्यक्ति की स्वतंत्रता और क्षमता के पक्षधर हैं।
Q38. Read the extract and answer the questions.
“मेरा आदर्श-समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित होगा।”
Q38(a). यह विचार किसका है?
यह विचार डॉ. भीमराव आंबेडकर का है।
यह “मेरी कल्पना का आदर्श समाज” अंश से जुड़ा है।
Q38(b). आदर्श समाज के तीन आधार कौन-से हैं?
आदर्श समाज के तीन आधार स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता हैं।
ये न्यायपूर्ण समाज के लिए जरूरी हैं।
Q38(c). भ्रातृता का अर्थ क्या है?
भ्रातृता का अर्थ भाईचारा और परस्पर सम्मान है।
इससे समाज में वास्तविक मेल बनता है।
Q38(d). यह विचार लोकतंत्र से कैसे जुड़ता है?
आंबेडकर लोकतंत्र को सामूहिक जीवनचर्या की रीति मानते हैं।
स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता लोकतंत्र को सामाजिक आधार देते हैं।
Q39. Read the extract and answer the questions.
“दासता केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता।”
Q39(a). लेखक दासता को कैसे समझते हैं?
लेखक दासता को व्यापक सामाजिक स्थिति के रूप में समझते हैं।
यह कानूनी गुलामी से आगे की बात है।
Q39(b). दासता कब होती है?
दासता तब भी होती है जब व्यक्ति दूसरों द्वारा तय व्यवहार और कर्तव्यों को मानने के लिए विवश हो।
ऐसी स्थिति कानूनी पराधीनता के बिना भी हो सकती है।
Q39(c). जाति-प्रथा से इसका क्या संबंध है?
जाति-प्रथा व्यक्ति को जन्म से तय पेशे में बाँधती है।
इसलिए वह सामाजिक दासता पैदा करती है।
Q39(d). यह विचार क्यों महत्वपूर्ण है?
यह विचार स्वतंत्रता की गहरी समझ देता है।
यह बताता है कि सामाजिक बंधन भी मनुष्य को गुलाम बना सकते हैं।
Q40. Read the extract and answer the questions.
“लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है।”
Q40(a). लोकतंत्र को लेखक क्या मानते हैं?
लेखक लोकतंत्र को सामूहिक जीवनचर्या की रीति मानते हैं।
यह समाज के अनुभवों के आदान-प्रदान से जुड़ा है।
Q40(b). लोकतंत्र के लिए कौन-सा भाव जरूरी है?
लोकतंत्र के लिए साथियों के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जरूरी है।
इसके बिना लोकतंत्र केवल औपचारिक व्यवस्था रह जाता है।
Q40(c). यह विचार किस पाठ से जुड़ा है?
यह विचार “मेरी कल्पना का आदर्श समाज” से जुड़ा है।
इसमें आंबेडकर आदर्श समाज की कल्पना रखते हैं।
Q40(d). इस विचार का आज क्या महत्व है?
आज यह विचार सामाजिक बराबरी और परस्पर सम्मान के लिए महत्वपूर्ण है।
यह लोकतंत्र को केवल चुनाव से आगे समझाता है।
NCERT Abhyas Prashn: Class 12 Hindi Aroh Chapter 15 Question Answer
ये प्रश्न NCERT अभ्यास से जुड़े हैं। उत्तरों में आंबेडकर के तर्क और पाठ का सामाजिक अर्थ शामिल करें।
Q41. जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
आंबेडकर जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन नहीं मानते क्योंकि यह प्राकृतिक या स्वैच्छिक विभाजन नहीं है।
श्रम-विभाजन क्षमता, रुचि और सामाजिक आवश्यकता पर आधारित हो सकता है। जाति-प्रथा व्यक्ति की योग्यता नहीं देखती। वह जन्म के आधार पर पेशा तय करती है।
दूसरी बात, जाति-प्रथा श्रमिकों को भी ऊँच-नीच में बाँटती है। कोई भी सभ्य श्रम-विभाजन मनुष्यों की गरिमा को इस प्रकार नहीं तोड़ता।
इसलिए आंबेडकर के अनुसार जाति-प्रथा श्रम-विभाजन का रूप नहीं, सामाजिक अन्याय का रूप है।
Q42. जाति-प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी और भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है?
जाति-प्रथा व्यक्ति को पैतृक पेशे से बाँध देती है।
यदि वह पेशा बदलती आर्थिक स्थिति में अनुपयोगी हो जाए, तब भी व्यक्ति को नया काम चुनने की स्वतंत्रता नहीं मिलती। आधुनिक उद्योग और तकनीक में परिवर्तन के कारण कई पेशे बदलते रहते हैं।
जब व्यक्ति अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार काम नहीं चुन पाता, तो उसकी आय कम होती है। कई बार वह बेरोजगारी और भुखमरी का सामना करता है।
इसलिए जाति-प्रथा आर्थिक संकट का भी कारण बनती रही है।
Q43. लेखक के मत से “दासता” की व्यापक परिभाषा क्या है?
लेखक के अनुसार, दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं है।
दासता वह स्थिति भी है जिसमें कुछ व्यक्तियों को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़े। व्यक्ति अपनी इच्छा से काम या जीवन का चुनाव न कर सके, तो वह भी दासता है।
जाति-प्रथा में व्यक्ति जन्म से तय पेशे और सामाजिक नियमों में बँध जाता है। इसलिए यह सामाजिक दासता का रूप है।
Q44. मनुष्यों में असमानता संभव रहने पर भी आंबेडकर समता को व्यावहारिक सिद्धांत क्यों मानते हैं?
आंबेडकर मानते हैं कि मनुष्य शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार और अपने प्रयासों में अलग-अलग हो सकते हैं।
फिर भी समाज के लिए समता जरूरी है। यदि बेहतर कुल, शिक्षा, संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा वाले लोगों को ही श्रेष्ठ व्यवहार मिले, तो यह न्याय नहीं होगा।
समाज को सबको समान अवसर देने चाहिए। व्यक्ति के हाथ में जो नहीं है, उसके आधार पर भेदभाव अनुचित है।
इसीलिए आंबेडकर समता को व्यवहार का न्यायपूर्ण और व्यावहारिक सिद्धांत मानते हैं।
Q45. क्या आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है?
हाँ, आंबेडकर ने जातिवाद का उन्मूलन मानवीय समता और भावनात्मक समत्व की दृष्टि से चाहा है।
वे केवल भौतिक सुविधाओं की बात नहीं करते। वे सम्मान, स्वतंत्रता, पेशा चुनने का अधिकार और सामाजिक मेल की बात करते हैं।
उनके आदर्श समाज में मनुष्य को उसकी जाति से नहीं, उसकी मनुष्यता से देखा जाता है।
इसलिए उनका लक्ष्य सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर पर समानता स्थापित करना है।
Q46. आदर्श समाज के तीन तत्वों में से “भ्रातृता” शब्द से आप कहाँ तक सहमत हैं?
“भ्रातृता” शब्द का अर्थ भाईचारा और परस्पर सम्मान है।
आंबेडकर इसे आदर्श समाज के लिए आवश्यक मानते हैं क्योंकि समाज केवल कानून से नहीं चलता। उसमें आपसी विश्वास, सहयोग और सम्मान भी चाहिए।
आज के संदर्भ में इस शब्द को व्यापक मानवीय बंधुत्व के रूप में समझना चाहिए। इसमें स्त्री, पुरुष और सभी समुदाय शामिल होने चाहिए।
यदि अधिक समावेशी शब्द चाहिए, तो “बंधुत्व” या “मानवीय मैत्री” भी कहा जा सकता है।
Paath Ke Aaspaas: Social Justice and Democracy Questions
इन प्रश्नों में पाठ को वर्तमान समाज, शिक्षा, पेशा और लोकतंत्र से जोड़कर समझना जरूरी है। उत्तर में संतुलित दृष्टि रखें।
Q47. कार्य-कुशलता पर जाति-प्रथा का क्या प्रभाव पड़ता है?
जाति-प्रथा कार्य-कुशलता को कमजोर करती है।
जब व्यक्ति अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार काम नहीं चुनता, तो काम में मन नहीं लगता। वह केवल मजबूरी से काम करता है। ऐसी स्थिति में न उत्साह पैदा होता है, न कौशल का विकास।
कुशल समाज के लिए व्यक्ति को प्रशिक्षण और पेशा चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
Q48. आज के समय में पेशा चुनने की स्वतंत्रता क्यों जरूरी है?
आज के समय में पेशा चुनने की स्वतंत्रता बहुत जरूरी है।
तकनीक, उद्योग और काम के अवसर तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में व्यक्ति को अपनी क्षमता, शिक्षा और रुचि के अनुसार काम चुनना पड़ता है।
अगर समाज जन्म या परिवार के आधार पर पेशा तय करे, तो प्रतिभा दब जाती है। इससे व्यक्ति और समाज दोनों का नुकसान होता है।
Q49. आंबेडकर का विचार शिक्षा से कैसे जुड़ता है?
आंबेडकर का विचार शिक्षा से गहराई से जुड़ा है।
शिक्षा व्यक्ति को अपनी क्षमता पहचानने और सामाजिक बंधनों को समझने की शक्ति देती है। जाति-प्रथा व्यक्ति को जन्म से तय स्थान पर रोकती है, जबकि शिक्षा उसे आगे बढ़ने का अवसर देती है।
इसीलिए आंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का साधन माना।
Q50. “समता” और “समान अवसर” में क्या संबंध है?
समता का वास्तविक अर्थ समान अवसर से जुड़ा है।
मनुष्य जन्म, परिवार और सामाजिक स्थिति में समान नहीं होते। इसलिए न्यायपूर्ण समाज को सबको शुरुआत से बेहतर अवसर देने चाहिए।
समान अवसर मिलने पर व्यक्ति अपनी क्षमता विकसित कर सकता है। यही समता का व्यावहारिक रूप है।
Chapter-Wise Revision for Important Questions Class 12 Hindi Aroh Chapter 15
Important Questions Class 12 Hindi Aroh Chapter 15 को पाँच भागों में पढ़ना चाहिए: लेखक-परिचय, जाति-प्रथा की आलोचना, श्रम-विभाजन, दासता और आदर्श समाज।
पहले डॉ. भीमराव आंबेडकर का परिचय पढ़ें। वे संविधान-निर्माता, सामाजिक चिंतक, विधिवेत्ता और मानव-मुक्ति के पक्षधर थे।
फिर “श्रम विभाजन और जाति-प्रथा” का मुख्य तर्क समझें। जाति-प्रथा श्रम-विभाजन नहीं, श्रमिक-विभाजन है।
इसके बाद पेशा चुनने की स्वतंत्रता पर ध्यान दें। यही पाठ का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक तर्क है।
फिर दासता की व्यापक परिभाषा पढ़ें। आंबेडकर सामाजिक बंधनों को भी दासता से जोड़ते हैं।
अंत में “मेरी कल्पना का आदर्श समाज” पढ़ें। स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता को अलग-अलग और साथ-साथ समझें।
Class 12 Hindi Aroh Chapter-Wise Important Questions