NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8
“अन्नाद् आनन्दं प्रति” पाठ तैत्तिरीयोपनिषद् में वर्णित भृगु-वरुण संवाद पर आधारित है, जिसमें अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द के माध्यम से समग्र जीवन-विकास की बात कही गई है।
NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8 में एकपदेन रिक्तस्थानपूर्ति, पूर्णवाक्य उत्तर, सत्य-असत्य, क्रियापद-मेलन, आत्मनेपदी धातुरूप, लोट्-लकार, कर्तृवाच्य-कर्मवाच्य और तव्यत्-अनीयर् प्रत्यय अभ्यास हल किए गए हैं।
अन्नाद् आनन्दं प्रति Class 9 में विद्यार्थी भृगु और वरुण के संवाद से समझते हैं कि मनुष्य का विकास केवल शरीर तक सीमित नहीं है। अन्नमयकोष, प्राणमयकोष, मनोमयकोष, विज्ञानमयकोष और आनन्दमयकोष के क्रमिक विकास से जीवन में संतुलन आता है। इस पाठ में अन्न की शुद्धता, प्राण की रक्षा, मन की साधना, बुद्धि का विकास और आनन्द की प्राप्ति को ब्रह्मज्ञान के द्वार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ये NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8 students को Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8 Question Answer, अन्नाद् आनन्दं प्रति exercise answers, Class 9 Sanskrit Chapter 8 grammar answers, आत्मनेपदिधातवः और कर्तृवाच्य-कर्मवाच्य revise करने में मदद करते हैं।
Key Takeaways
- पाठ का नाम: अन्नाद् आनन्दं प्रति
- स्रोत: तैत्तिरीयोपनिषद् में भृगु-वरुण संवाद
- मुख्य पात्र: भृगुः और वरुणः
- मुख्य विषय: अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द और पञ्चकोष-विकास
- मुख्य अभ्यास: रिक्तस्थानपूर्ति, पूर्णवाक्य उत्तर, सत्य-असत्य, क्रियापद-मेलन, लट्-लकार, लोट्-लकार, कर्तृवाच्य-कर्मवाच्य
NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8 Structure 2026
| Section | Text / Skill Area | Main Question Type |
| अभ्यासाद् जायते सिद्धिः | textbook exercises | रिक्तस्थान, पूर्णवाक्य उत्तर, सत्य-असत्य |
| व्याकरण | आत्मनेपदिधातवः, लट्-लकार, लोट्-लकार | धातुरूप और क्रियापद |
| वाच्य | कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य | वाक्य-परिवर्तन |
| प्रत्यय | तव्यत् और अनीयर् प्रत्यय | योग्य / कर्तव्य अर्थ |
NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8: अन्नाद् आनन्दं प्रति
इस section में अन्नाद् आनन्दं प्रति question answer पुस्तक के अभ्यास-क्रम के अनुसार दिए गए हैं। यह विद्यार्थियों को Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8 solutions को textbook-based format में समझने में मदद करता है।
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
1. एकेन पदेन रिक्तस्थानं पूरयत
यह भाग NCERT Class 9 Sanskrit Solutions के अनुसार पाठ-आधारित एकपदेन उत्तरों का अभ्यास कराता है।
उदाहरण: अन्नेन शरीरं वर्धते।
उत्तर: अन्नेन।
(क) __________ शरीरं वर्धते।
उत्तर: अन्नेन।
(ख) __________ शरीरं प्रतिष्ठितम्।
उत्तर: प्राणे।
(ग) __________ विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।
उत्तर: प्राणेन।
(घ) __________ एव इमानि भूतानि जायन्ते।
उत्तर: प्राणात्।
(ङ) __________ समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
उत्तर: मनसा।
(च) __________ विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति।
उत्तर: बुद्धितत्त्वं।
(छ) __________ एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।
उत्तर: मनः।
2. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत
यह section Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8 Question Answer में संस्कृत पूर्णवाक्य उत्तरों का अभ्यास कराता है।
(क) भृगोः जिज्ञासा कस्मिन् विषये आसीत्?
उत्तर: भृगोः जिज्ञासा ब्रह्मविषये आसीत्।
हिंदी अर्थ: भृगु की जिज्ञासा ब्रह्म के विषय में थी।
(ख) भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय किम् आचरितम्?
उत्तर: भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय तपः आचरितम्।
हिंदी अर्थ: भृगु ने ब्रह्मज्ञान के लिए तप किया।
(ग) भृगुः प्रथमं तपसा ब्रह्मरूपेण किं ज्ञातवान्?
उत्तर: भृगुः प्रथमं तपसा अन्नं ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान्।
हिंदी अर्थ: भृगु ने पहले तप से अन्न को ब्रह्मरूप में जाना।
(घ) मनसः के जायन्ते?
उत्तर: मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते।
हिंदी अर्थ: मन से संकल्प, भाव और विचार उत्पन्न होते हैं।
(ङ) प्राणिनः कस्मात् जायन्ते?
उत्तर: प्राणिनः अन्नात् जायन्ते।
हिंदी अर्थ: प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं।
(च) इन्द्रियाणि केन सञ्चाल्यन्ते?
उत्तर: इन्द्रियाणि मनसा सञ्चाल्यन्ते।
हिंदी अर्थ: इन्द्रियाँ मन से संचालित होती हैं।
(छ) शरीरं कुत्र प्रतिष्ठितम् अस्ति?
उत्तर: शरीरं प्राणे प्रतिष्ठितम् अस्ति।
हिंदी अर्थ: शरीर प्राण में स्थित है।
(ज) केन विना स्मृतिशक्तेः विकासो न भवति?
उत्तर: बुद्धितत्त्वं विना स्मृतिशक्तेः विकासो न भवति।
हिंदी अर्थ: बुद्धि-तत्त्व के बिना स्मृति-शक्ति का विकास नहीं होता।
(झ) भृगुः तपसा केषां महत्त्वं ज्ञातवान्?
उत्तर: भृगुः तपसा अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्।
हिंदी अर्थ: भृगु ने तप से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द का महत्व जाना।
3. उदाहरणं दृष्ट्वा अधोलिखितेषु ‘किं सत्यं किम् असत्यम्’ इति रिक्तस्थाने पूरयत
उदाहरण: प्रस्तुत पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति।
उत्तर: सत्यम्।
(क) प्रस्तुत पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति।
उत्तर: सत्यम्।
(ख) अस्मिन् संवादे अन्नस्य महत्त्वं वर्णितम्।
उत्तर: सत्यम्।
(ग) प्राणिनः मनसः जायन्ते इति कथनम् अस्ति।
उत्तर: असत्यम्।
तर्क: पाठ में प्राणिनः अन्नात् जायन्ते इति भावः दिया गया है।
(घ) अन्नेन शरीरं वर्धते इति।
उत्तर: सत्यम्।
(ङ) मनः सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति।
उत्तर: असत्यम्।
तर्क: पाठ में बुद्धिः सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति इति विचार दिया गया है।
(च) भृगुः वरुणस्य पुत्रोऽस्ति।
उत्तर: सत्यम्।
(छ) भृगुः तपसा मनो ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान्।
उत्तर: सत्यम्।
(ज) विना योगे तृतीया विभक्तिः भवति।
उत्तर: सत्यम्।
4. क्रियापदेन सह समुचितं पद योजयत
| पदम् | सही क्रियापदम् |
| (क) प्राणिनः | 3. जायन्ते |
| (ख) शरीरम् | 4. वर्धते |
| (ग) तपः | 2. कुरुताम् |
| (घ) पितरम् | 5. ब्रूते |
| (ङ) यत्नः | 1. क्रियताम् |
5. अवशिष्ट-धातुरूपाणि पूरयत
यह भाग आत्मनेपदी धातुओं के लट्-लकार रूपों की तैयारी कराता है।
(क) वर्त्-धातुः, लट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | वर्तते | वर्तेते | वर्तन्ते |
| मध्यमपुरुषः | वर्तसे | वर्तेथे | वर्तध्वे |
| उत्तमपुरुषः | वर्ते | वर्तावहे | वर्तामहे |
(ख) मोद्-धातुः, लट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | मोदते | मोदेते | मोदन्ते |
| मध्यमपुरुषः | मोदसे | मोदेथे | मोदध्वे |
| उत्तमपुरुषः | मोदे | मोदावहे | मोदामहे |
(ग) वृध्-धातुः, लट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | वर्धते | वर्धेते | वर्धन्ते |
| मध्यमपुरुषः | वर्धसे | वर्धेथे | वर्धध्वे |
| उत्तमपुरुषः | वर्धे | वर्धावहे | वर्धामहे |
6. एतानि पदानि लट्-लकारस्य त्रिषु पुरुषेषु रूपाणि पठत लिखत च
यह section आत्मनेपदिधातवः और लट्-लकार अभ्यास के लिए है।
दिए गए पद: लभते, जायते, भाषते, विद्यते, मोदते, सेवते, सहते, शोभते, यतते, वर्धते, मन्यते, द्योतते, रोचते, कम्पते, याचते, स्पर्धते, लज्जते, क्षीयते
(क) लभ्-धातुः, लट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | लभते | लभेते | लभन्ते |
| मध्यमपुरुषः | लभसे | लभेथे | लभध्वे |
| उत्तमपुरुषः | लभे | लभावहे | लभामहे |
(ख) भाष्-धातुः, लट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | भाषते | भाषेते | भाषन्ते |
| मध्यमपुरुषः | भाषसे | भाषेथे | भाषध्वे |
| उत्तमपुरुषः | भाषे | भाषावहे | भाषामहे |
(ग) सेव्-धातुः, लट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | सेवते | सेवेते | सेवन्ते |
| मध्यमपुरुषः | सेवसे | सेवेथे | सेवध्वे |
| उत्तमपुरुषः | सेवे | सेवावहे | सेवामहे |
7. आत्मनेपदिधातूनां लोट्-लकारे त्रिषु पुरुषेषु अभ्यासं कुरुत लिखत च
यह भाग लोट्-लकारः में आत्मनेपदी धातुओं के रूप समझने में मदद करता है।
(क) वन्द्-धातुः, लोट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | वन्दताम् | वन्देताम् | वन्दन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः | वन्दस्व | वन्देथाम् | वन्दध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | वन्दै | वन्दावहै | वन्दामहै |
(ख) कृ-धातुः, लोट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | कुरुताम् | कुर्वाताम् | कुर्वताम् |
| मध्यमपुरुषः | कुरुष्व | कुर्वाथाम् | कुरुध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | करवै | करवावहै | करवामहै |
(ग) मोद्-धातुः, लोट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | मोदताम् | मोदेताम् | मोदन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः | मोदस्व | मोदेथाम् | मोदध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | मोदै | मोदावहै | मोदामहै |
(घ) वृध्-धातुः, लोट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | वर्धताम् | वर्धेताम् | वर्धन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः | वर्धस्व | वर्धेथाम् | वर्धध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | वर्धै | वर्धावहै | वर्धामहै |
8. एतानि क्रियापदानि लोट्-लकारे त्रिषु पुरुषेषु पठत लिखत च
दिए गए पद: लभताम्, सेवताम्, जयताम्, भाषताम्, विद्यताम्, सहताम्, यतताम्, याचताम्, स्पर्धताम्, लज्जताम्, कुरुताम्
(क) लभ्-धातुः, लोट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | लभताम् | लभेताम् | लभन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः | लभस्व | लभेथाम् | लभध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | लभै | लभावहै | लभामहै |
(ख) सेव्-धातुः, लोट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | सेवताम् | सेवेताम् | सेवन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः | सेवस्व | सेवेथाम् | सेवध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | सेवै | सेवावहै | सेवामहै |
(ग) यत्-धातुः, लोट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | यतताम् | यतेताम् | यतन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः | यतस्व | यतेथाम् | यतध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | यतै | यतावहै | यतामहै |
कर्तृपदानुसारं लोट्-लकारेण क्रियापदं परिवर्तयत
यह section Class 9 Sanskrit Chapter 8 grammar answers में लट्-लकार से लोट्-लकार रूपांतरण का अभ्यास कराता है।
उदाहरण: सः अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवते।
उत्तर: भवान् सदा अन्नम् ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्।
(क) बालकः अन्नस्य निन्दां न कुरुते।
उत्तर: भवान् अन्नस्य निन्दां न कुरुताम्।
(ख) मम जीवने यशो वर्धते।
उत्तर: तव जीवने यशो वर्धताम्।
(ग) अहं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुर्वे।
उत्तर: त्वं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुरुष्व।
(घ) रमेशः सर्वदा सत्यं भाषते।
उत्तर: दिनेशः सर्वदा सत्यं भाषताम्।
(ङ) छात्रः लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहते।
उत्तर: अहं लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहै।
(च) साधवः सर्वदा रमन्ते।
उत्तर: भवन्तः सर्वदा रमन्ताम्।
(छ) भवान् योगेन आरोग्यं लभते।
उत्तर: अहं योगेन आरोग्यं लभै।
(ज) रमा सदा सत्कर्मणि यतते।
उत्तर: लता सदा सत्कर्मणि यतताम्।
(झ) भक्तः ईश्वरं वन्दते।
उत्तर: त्वं ईश्वरं वन्दस्व।
कर्तृ-कर्मवाच्यनियमः
यह grammar note कर्तृवाच्य कर्मवाच्य की मूल समझ देता है।
(क) कर्तृवाच्ये कः नियमः भवति?
उत्तर: कर्तृवाच्ये कर्तरि प्रथमा विभक्तिः, कर्मणि द्वितीया विभक्तिः च भवति। क्रिया कर्तृपदानुसारिणी भवति।
हिंदी अर्थ: कर्तृवाच्य में कर्ता प्रथमा विभक्ति में और कर्म द्वितीया विभक्ति में होता है। क्रिया कर्ता के अनुसार होती है।
(ख) कर्मवाच्ये कः नियमः भवति?
उत्तर: कर्मवाच्ये कर्मणि प्रथमा विभक्तिः, कर्तरि तृतीया विभक्तिः च भवति। क्रिया कर्मपदानुसारिणी भवति। कर्मवाच्ये क्रियापदानि आत्मनेपदयुक्तानि भवन्ति।
हिंदी अर्थ: कर्मवाच्य में कर्म प्रथमा विभक्ति में और कर्ता तृतीया विभक्ति में होता है। क्रिया कर्म के अनुसार होती है और आत्मनेपदी रूप में आती है।
(ग) कर्तृवाच्य-कर्मवाच्य उदाहरणानि लिखत।
| कर्तृवाच्यम् | कर्मवाच्यम् |
| रामः पाठं पठति। | रामेण पाठः पठ्यते। |
| छात्राः विद्यालयं गच्छन्ति। | छात्रैः विद्यालयः गम्यते। |
| बालिकाः गीतं गायन्ति। | बालिकाभिः गीतं गीयते। |
| छात्रः श्लोकान् लिखति। | छात्रेण श्लोकाः लिख्यन्ते। |
| माता पुत्रौ पश्यति। | मात्रा पुत्रौ दृश्येते। |
| मनः सर्वाणि इन्द्रियाणि सञ्चालयति। | मनसा सर्वाणि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते। |
तव्यत्-अनीयर्-प्रत्यययोः प्रयोगः
(क) तव्यत्-अनीयर्-प्रत्ययौ कदा प्रयुज्येते?
उत्तर: तव्यत्-अनीयर्-प्रत्ययौ लृट्-लकार, लोट्-लकार, विधिलिङ्-लकाराणां विषये योग्यार्थे च प्रयुज्येते।
हिंदी अर्थ: तव्यत् और अनीयर् प्रत्यय भविष्य, आदेश, विधि या योग्य अर्थ में प्रयोग होते हैं।
(ख) तव्यत्-अनीयर् प्रत्यययोः उदाहरणानि लिखत।
| मूल वाक्य | तव्यत्-प्रयोगः | अनीयर्-प्रयोगः |
| अन्नं न परिहरेत्। | अन्नं न परिहर्तव्यम्। | अन्नं न परिहरणीयम्। |
| मानवः क्रोधं त्यजेत्। | मानवेन क्रोधः त्यक्तव्यः। | मानवेन क्रोधः त्यजनीयः। |
| मनः सदा सत्कर्मणा साध्नुयात्। | मनः सदा सत्कर्मणा साद्धव्यम्। | मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्। |
| सर्वदा ईश्वरं सेवेत। | सर्वदा ईश्वरः सेवितव्यः। | सर्वदा ईश्वरः सेवनीयः। |
| प्रतिदिनं योगासनं कुर्यात्। | प्रतिदिनं योगासनं कर्तव्यम्। | प्रतिदिनं योगासनं करणीयम्। |
स्वाध्यायान्मा प्रमदः
1. आत्मनेपदिधातूनां लोट्-लकारे त्रिषु पुरुषेषु अभ्यासं कुरुत
(क) वन्द्-धातुः, लट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | वन्दते | वन्देते | वन्दन्ते |
| मध्यमपुरुषः | वन्दसे | वन्देथे | वन्दध्वे |
| उत्तमपुरुषः | वन्दे | वन्दावहे | वन्दामहे |
(ख) कृ-धातुः, लट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | कुरुते | कुर्वाते | कुर्वते |
| मध्यमपुरुषः | कुरुषे | कुर्वाथे | कुर्वध्वे |
| उत्तमपुरुषः | कुर्वे | कुर्वहे | कुर्महे |
2. एतेषु वाक्येषु निहितानि क्रियापदानि उच्चैः पठत
(क) एकवचन-बहुवचन रूपों को पढ़िए।
| एकवचनरूपाणि | बहुवचनरूपाणि |
| बालकः उद्याने रमते। | बालकाः उद्याने रमन्ते। |
| शिष्यः गुरुं सेवते। | शिष्याः गुरुं सेवन्ते। |
| रात्रौ चन्द्रः राजते। | साधुपुरुषाः सर्वत्र राजन्ते। |
| वृक्षः वायुना कम्पते। | वृक्षाः वायुना कम्पन्ते। |
| कण्ठे हारः शोभते। | वृक्षे पुष्पाणि शोभन्ते। |
| योगासनेन मानवः आरोग्यं लभते। | योगासनेन मानवाः आरोग्यं लभन्ते। |
| भिक्षुः धनं याचते। | भिक्षुकाः धनं याचन्ते। |
| छात्रः गृहकार्यं कुरुते। | छात्राः गृहकार्यं कुर्वते। |
3. आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते
(क) “आहारात् सर्वभूतानि…” श्लोकस्य अन्वयं भावार्थं च लिखत।
उत्तर:
श्लोकः:
आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते।
आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः॥
अन्वयः: हे महीपते! सर्वभूतानि आहारात् सम्भवन्ति, आहारेण जन्तवः विवर्धन्ते, तेन आहारेण जीवन्ति च।
भावार्थ: हे राजन्! सभी प्राणी अन्न आदि भोज्य पदार्थों से उत्पन्न होते हैं। प्राणी आहार से ही शरीर का विकास प्राप्त करते हैं और उसी आहार से जीवित रहते हैं।
4. यावद् वायुः स्थितो देहे
(क) “यावद् वायुः स्थितो देहे…” श्लोकस्य अन्वयं भावार्थं च लिखत।
उत्तर:
श्लोकः:
यावद् वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत्॥
अन्वयः: यावत् देहे वायुः स्थितः, तावत् जीवनम् उच्यते। तस्य निष्क्रान्तिः मरणम्, ततः वायुं निरोधयेत्।
भावार्थ: जब तक शरीर में प्राणवायु रहती है, तब तक जीवन है। प्राणवायु का शरीर से निकलना ही मृत्यु है। इसलिए प्राणवायु की रक्षा करनी चाहिए। प्राणमयकोष के विकास के लिए प्राणायाम, आसन, समय पर शयन और समय पर जागरण आवश्यक हैं।
5. मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः
(क) “मन एव मनुष्याणां…” श्लोकस्य अन्वयं भावार्थं च लिखत।
उत्तर:
श्लोकः:
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥
अन्वयः: मनः एव मनुष्याणां बन्धमोक्षयोः कारणम्। विषयासक्तं मनः बन्धाय, निर्विषयं मनः मुक्त्यै स्मृतम् अस्ति।
भावार्थ: मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है। यदि मन विषयों में आसक्त होता है, तो वह बंधन का कारण बनता है। यदि मन निर्मल, शांत और राग-द्वेष से मुक्त होता है, तो वह मोक्ष का कारण बनता है।
6. मनो हि द्विविधं प्रोक्तम्
(क) “मनो हि द्विविधं प्रोक्तम्…” श्लोकस्य भावार्थं लिखत।
उत्तर:
इस श्लोक में कहा गया है कि मन दो प्रकार का होता है—शुद्ध और अशुद्ध। काम-संकल्प से युक्त मन अशुद्ध होता है, जबकि कामनाओं से रहित मन शुद्ध होता है। मनोमयकोष के विकास के लिए मन को निर्मल, शांत और सत्कर्ममय बनाना चाहिए।
7. मनसः विषयाः
(क) मनसः विषयाः के सन्ति?
उत्तर: कामः, सङ्कल्पः, विचिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृतिः, अधृतिः, ह्रीः, धीः, भीः इत्येतत् सर्वं मन एव।
हिंदी अर्थ: इच्छा, संकल्प, संदेह, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि और भय—ये सब मन के विषय हैं।
8. यन्मनसा ध्यायति
(क) “यन्मनसा ध्यायति…” वचनस्य आशयं लिखत।
उत्तर: इस वचन का आशय है कि मनुष्य जैसा मन में सोचता है, वैसा वाणी से बोलता है; जैसा बोलता है, वैसा कर्म से करता है; और जैसा कर्म करता है, वैसा ही परिणाम प्राप्त करता है। इसलिए मन को शुद्ध, शांत और सत्कर्म की ओर लगाना आवश्यक है।
यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्
1. एकां छात्रसंगोष्ठीम् आयोज्य अस्य पाठस्य अस्माकं जीवने कीदृशी प्रासङ्गिकता अस्ति इति स्वविचारान् उपस्थापयत।
(क) अस्य पाठस्य अस्माकं जीवने प्रासङ्गिकता लिखत।
उत्तर:
“अन्नाद् आनन्दं प्रति” पाठ हमारे जीवन में बहुत प्रासंगिक है। यह बताता है कि शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आनन्द—इन सबका संतुलित विकास आवश्यक है। शुद्ध आहार से शरीर और मन स्वस्थ रहते हैं। प्राणायाम से प्राणशक्ति बढ़ती है। सत्कर्म से मन शुद्ध होता है। अध्ययन और ध्यान से बुद्धि विकसित होती है। सेवा, दया और ईश्वरचिंतन से आनन्द प्राप्त होता है। इसलिए यह पाठ स्वास्थ्य, अनुशासन, आत्मविकास और आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देता है।
2. पाठे आगतानाम् उपनिषद्वचनानाम् आशयं दशसु वाक्येषु प्रकटयत।
(क) उपनिषद्वचनानाम् आशयं दशसु वाक्येषु लिखत।
उत्तर:
- अन्नात् सर्वे प्राणिनः जायन्ते।
- अन्नेन शरीरं बलं च वर्धेते।
- अन्नं न निन्दनीयम्।
- प्राणः जीवनस्य आधारः अस्ति।
- प्राणायामेन प्राणशक्तिः वर्धते।
- मनः सर्वकर्मणः प्रवर्तकम् अस्ति।
- मनसः शुद्धिः जीवनविकासाय आवश्यकी अस्ति।
- बुद्धितत्त्वेन विवेकः निर्णयशक्तिः च विकसिते भवतः।
- आनन्दः सर्वकर्मणां लक्ष्यं भवति।
- पञ्चकोषाणां विकासेन मनुष्यः पूर्णतां प्राप्नोति।
3. पाठे आगतानि क्रियापदानि चित्वा विंशतिवाक्यानि रचयत।
(क) क्रियापदानि प्रयुज्य विंशतिवाक्यानि लिखत।
उत्तर:
- भृगुः पितरं प्रति गच्छति।
- वरुणः पुत्रं बोधयति।
- भृगुः तपः आचरति।
- अन्नेन शरीरं वर्धते।
- प्राणिनः अन्नात् जायन्ते।
- मानवः अन्नेन जीवति।
- शरीरं प्राणे प्रतिष्ठितम् अस्ति।
- प्राणायामः प्रतिदिनं क्रियते।
- मनसा इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
- मनुष्यः मनसा चिन्तयति।
- बुद्धिः कर्मणि प्रवर्तयति।
- विवेकः बुद्धौ वर्तते।
- छात्रः ध्यानं करोति।
- योगासनं आरोग्यं ददाति।
- साधकः ईश्वरं सेवते।
- भक्तः मोदते।
- मनः सत्कर्मणा साधनीयम्।
- क्रोधः त्यक्तव्यः।
- आहारः शुद्धः भवेत्।
- आनन्दः जीवनस्य लक्ष्यं भवति।
4. अन्नरक्षणाय भवता के उपायाः क्रियन्ते इति वर्णयत।
(क) अन्नरक्षणस्य उपायान् लिखत।
उत्तर:
अन्नरक्षणाय अहं एते उपायाः करोमि—
- आवश्यकतायाः अनुसारमेव भोजनं गृह्णामि।
- थाल्यां भोजनं न त्यजामि।
- अन्नस्य निन्दां न करोमि।
- अवशिष्टम् अन्नं व्यर्थं न क्षिपामि।
- अन्नं स्वच्छस्थाने सुरक्षितं स्थापयामि।
- अन्नदानं श्रेष्ठं कर्म इति मन्ये।
- कृषकाणां परिश्रमं स्मृत्वा अन्नस्य आदरं करोमि।
5. मनसः कार्यं दशसु वाक्येषु निरूपयत।
(क) मनसः कार्याणि दशसु वाक्येषु लिखत।
उत्तर:
- मनः सर्वकर्मणः प्रवर्तकम् अस्ति।
- मनसा मनुष्यः चिन्तयति।
- मनसा सङ्कल्पाः जायन्ते।
- मनसा विचाराः भवन्ति।
- मनसा भावाः उत्पद्यन्ते।
- मनसा इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
- मनः शुद्धं चेत् जीवनं शान्तं भवति।
- मनः अशुद्धं चेत् दुःखं भवति।
- मनः बन्धस्य मोक्षस्य च कारणम् अस्ति।
- मनः सत्कर्मणा साधनीयम्।
6. केषाञ्चन त्रयाणाम् आत्मनेपदिधातूनां लट्-लोट्-लकारयोः त्रिषु पुरुषेषु रूपाणि स्मरत लिखत च।
(क) सेव्, लभ् और यत् धातुओं के लट्-लोट् रूप लिखिए।
उत्तर:
| धातुः | लट्-लकारः प्रथमपुरुष एकवचनम् | लोट्-लकारः प्रथमपुरुष एकवचनम् |
| सेव् | सेवते | सेवताम् |
| लभ् | लभते | लभताम् |
| यत् | यतते | यतताम् |
7. अस्माकं जीवने प्रत्येकं कोषस्य विकासाय किं किं कर्तुं शक्यते इत्युपरि चर्चां कुरुत।
(क) पञ्चकोषविकासाय उपायान् लिखत।
उत्तर:
| कोषः | विकासाय उपायाः |
| अन्नमयकोषः | सात्त्विक आहार, स्वच्छ भोजन, अन्नरक्षण |
| प्राणमयकोषः | प्राणायाम, योगासन, समय पर शयन-जागरण |
| मनोमयकोषः | सत्कर्म, शान्ति, राग-द्वेष से दूरी |
| विज्ञानमयकोषः | अध्ययन, ध्यान, विवेक, तर्क, निर्णयशक्ति |
| आनन्दमयकोषः | सेवा, दया, परोपकार, ईश्वरचिन्तन |
उपनिषद्वचनानि
(क) एतानि उपनिषद्वचनानि उच्चैः पठन्तु स्मरन्तु च
उत्तर:
- अन्नादेव खलु इमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति।
- अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात् सर्वौषधम् उच्यते।
- अन्नं न निन्द्यात्। अन्नं बहुकुर्वीत।
- प्राणो हि भूतानाम् आयुः। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। प्राणो वै ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च।
- कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव।
- तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।
शब्द-संपदा
| शब्द | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
| अन्वेष्टव्यम् | खोज करनी चाहिए | Explore |
| अवबद्धम् | समझा गया | Understood |
| उदीरितम् | कहा गया | Spoken |
| कामः | इच्छा | Desire |
| कुर्वीत | करना चाहिए | Should do |
| धृतिः | धैर्य | Courage |
| धीः | बुद्धि | Intelligence |
| निष्क्रान्तिः | बाहर जाना | Going out |
| परिहर्तव्यम् | त्याग करना चाहिए | To be discarded |
| प्रकटितम् | प्रकट हुआ | Revealed |
| प्राणः | प्राणवायु | Life-breath |
| ब्रह्म | परमात्मा | Supreme being |
| भूतानि | प्राणी | Living beings |
| विचिकित्सा | सन्देह | Doubt |
| विज्ञानम् | बुद्धि | Intellect |
| विप्रमोक्षः | अत्यन्त मोक्ष | Final liberation |
| विवर्धन्ते | वृद्धि को प्राप्त होते हैं | Grow |
| श्रद्धा | निष्ठा | Faith |
| सङ्कल्पः | संकल्प | Resolve |
| सम्भवन्ति | उत्पन्न होते हैं | Arise |
| सर्वग्रन्थीनाम् | सभी सन्देहों के | Of all doubts |
| साधनीयम् | संस्कार करना चाहिए | Should be achieved |
| स्मृतिलम्भे | ध्रुवस्मृति की प्राप्ति होने पर | On self-actualization |
| हातव्याः | त्याग करना चाहिए | Should be sacrificed |
| ह्रीः | लज्जा | Modesty |
Chapter-Wise NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada
| Chapter No. | Chapter Name | NCERT Solutions |
| Chapter 1 | सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् | NCERT Solutions |
| Chapter 2 | सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः | NCERT Solutions |
| Chapter 3 | आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः | NCERT Solutions |
| Chapter 4 | न खलु वयस्तेजसो हेतुः | NCERT Solutions |
| Chapter 5 | एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी | NCERT Solutions |
| Chapter 6 | मनःपूतं समाचरेत् | NCERT Solutions |
| Chapter 7 | उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् | NCERT Solutions |
| Chapter 8 | अन्नाद् आनन्दं प्रति | NCERT Solutions |
| Chapter 9 | कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः | NCERT Solutions |
| Chapter 10 | णमो अरिहंताणम् | NCERT Solutions |
| Chapter 11 | वर्णोच्चारण-शिक्षा २ | NCERT Solutions |
| Chapter 12 | अन्वयः | NCERT Solutions |
| Chapter 13 | समासः | NCERT Solutions |
| Chapter 14 | वाच्यम् | NCERT Solutions |
| Chapter 15 | शब्दरूपाणि | NCERT Solutions |
| Chapter 16 | धातुरूपाणि | NCERT Solutions |
Topics Covered in NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8
NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8 cover the Upanishadic dialogue, grammar exercises and value-based activities from “अन्नाद् आनन्दं प्रति”.
- तैत्तिरीयोपनिषद् में वर्णित भृगु-वरुण संवाद
- ब्रह्मज्ञान के लिए तप, यत्न, अभ्यास और स्वअन्वेषण का महत्व
- अन्न को शरीर, बल, आयु, मेधा, आरोग्य और स्मृति का आधार मानना
- प्राण को जीवन, शारीरिक क्रिया और प्राणशक्ति का आधार समझना
- मन को संकल्प, विचार, भावना और इन्द्रिय-संचालन का केंद्र मानना
- विज्ञान या बुद्धि को बोध, तर्क, विवेक, निर्णय और स्मृति से जोड़ना
- आनन्द को मानवकर्मों का लक्ष्य और आध्यात्मिक विकास का चरण समझना
- पञ्चकोष: अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय
- एकपदेन रिक्तस्थानपूर्ति और पूर्णवाक्य उत्तर लेखन
- सत्य-असत्य कथनों की पाठाधारित पहचान
- आत्मनेपदिधातवः और लट्-लकार, लोट्-लकार रूप
- कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य के नियम और उदाहरण
- तव्यत् और अनीयर् प्रत्यय के प्रयोग
- उपनिषद्वचन, आहारशुद्धि, प्राणायाम और मनशुद्धि की समझ
- अन्नरक्षण, मनसः कार्य और पञ्चकोष-विकास पर गतिविधियाँ
Important Concepts in NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8
| Concept | Explanation | Exam Use |
| अन्नं वै ब्रह्म | अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और शरीर विकसित होता है। | पूर्णवाक्य उत्तर |
| प्राणो वै ब्रह्म | प्राण जीवन का आधार है; प्राणवायु से शरीर चलता है। | भावार्थ |
| मनो वै ब्रह्म | मन संकल्प, विचार, भावना और कर्म का प्रवर्तक है। | पाठ-समझ |
| विज्ञानं वै ब्रह्म | बुद्धि से विवेक, तर्क, निर्णय और स्मृति विकसित होती है। | अवधारणा |
| आनन्दो वै ब्रह्म | आनन्द मनुष्य के कर्मों का अंतिम लक्ष्य है। | मुख्य संदेश |
| पञ्चकोषाः | अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय | अवधारणा |
| आत्मनेपदिधातवः | लभते, सेवते, यतते आदि धातु-रूप | Grammar |
| लोट्-लकारः | आदेश / आग्रह के अर्थ में प्रयोग | धातुरूप |
| कर्तृवाच्य | कर्ता प्रधान होता है और क्रिया कर्ता के अनुसार होती है। | वाच्य |
| कर्मवाच्य | कर्म प्रधान होता है और क्रिया कर्म के अनुसार होती है। | वाक्य-परिवर्तन |
| तव्यत्-अनीयर् प्रत्यय | कर्तव्य या योग्य अर्थ में प्रयोग | प्रत्यय |
Chapter-Wise NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Sharada
| Chapter No. | Chapter Name |
| Chapter 1 | सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् |
| Chapter 2 | सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः |
| Chapter 3 | आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः |
| Chapter 4 | न खलु वयस्तेजसो हेतुः |
| Chapter 5 | एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी |
| Chapter 6 | मनःपूतं समाचरेत् |
| Chapter 7 | उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् |
| Chapter 8 | अन्नाद् आनन्दं प्रति |
| Chapter 9 | कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः |
| Chapter 10 | णमो अरिहंताणम् |
| Chapter 11 | वर्णोच्चारण-शिक्षा २ |
| Chapter 12 | अन्वयः |
| Chapter 13 | समासः |
| Chapter 14 | वाच्यम् |
| Chapter 15 | शब्दरूपाणि |
| Chapter 16 | धातुरूपाणि |
FAQs (Frequently Asked Questions)
“अन्नाद् आनन्दं प्रति” पाठ तैत्तिरीयोपनिषद् में वर्णित भृगु और वरुण के संवाद पर आधारित है। इसमें भृगु अपने पिता वरुण से ब्रह्मज्ञान के विषय में पूछता है और तप द्वारा अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द का महत्व समझता है।
इस chapter में पाँच कोष बताए गए हैं—अन्नमयकोषः, प्राणमयकोषः, मनोमयकोषः, विज्ञानमयकोषः और आनन्दमयकोषः। इनका क्रमिक विकास मनुष्य के समग्र जीवन-विकास के लिए आवश्यक माना गया है।
“अन्नं वै ब्रह्म” का अर्थ है कि अन्न जीवन का मूल आधार है। प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न से जीवित रहते हैं और अन्न से शरीर, बल, आयु, मेधा और आरोग्य का विकास होता है।
प्राणमयकोष के विकास के लिए प्रतिदिन प्राणायाम, योगासन, समय पर शयन, समय पर जागरण और शुद्ध जीवनचर्या का अभ्यास करना चाहिए। पाठ में प्राण को जीवन का आधार बताया गया है।
Class 9 Sanskrit Chapter 8 grammar answers में आत्मनेपदिधातवः, लट्-लकार, लोट्-लकार, कर्तृवाच्य-कर्मवाच्य, तव्यत्-अनीयर् प्रत्यय, क्रियापद-मेलन, सत्य-असत्य और रिक्तस्थानपूर्ति जैसे topics आते हैं।